जयपुर

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18 से कम उम्र की 700 बच्चियां हर साल दुष्कर्म की शिकार, न उम्र मायने रखती है, न रिश्ते, न जगह

दुष्कर्म पीड़िताओं को धीमे न्याय के खिलाफ भास्कर सीरीज के भाग-3

Dainik Bhaskar

Jun 14, 2018, 09:06 AM IST
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जयपुर. क्या आपको पता है? हमारी बच्चियों के लिए सबसे खतरनाक जगह कौनसी है?....जवाब है : घर। सबसे असुरक्षित हाथ कौन से हैं : हमारे अपनों के हाथ...। यह सच भरोसा तोड़ देने वाला है। रेप कहां हुआ...यह जांच का सबसे अहम सवाल होता है। भास्कर ने भी इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए 743 एफआईआर पढ़ीं। जो सच सामने आया...वो डराने वाला था। घर, ट्यूशन सेंटर....यहां तक कि धार्मिक स्थल भी इस पाप से नहीं बच पाए हैं।
नेशनल क्राइम रिकॉडर्स ब्यूरो की 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार दुष्कर्म के 95% मामलों में गुनहगार परिचित ही निकले। परिचित भी कौन...पिता, भाई, दादा जैसे रिश्ते, रोज घर आने वाले नज़दीकी। दरअसल न कोई जगह सुरक्षित है...न असुरक्षित...। न उम्र मायने रखती है, न जगह। यह सिर्फ दूषित मानसिकता है जिसका खामियाजा बच्चियों को भुगतना पड़ता है। पढ़िए विशेष रिपोर्ट-

काश! वे दीवारें, कमरे, सीढ़ियां भी गवाही दे पाते

भास्कर ने 743 एफआईआर पढ़ी हैं, दुष्कर्म के अनगिनत मामलों को देखते हुए ये सिर्फ प्रतिनिधि चेहरा हैं। ये एफआईआर हमारे समाज का सबसे कड़वा सच सामने रखती हैं। एफआईआर बताती हैं कि किस तरह 55% मामलों में घर बच्चियों के लिए सबसे खतरनाक जगह बने हुए हैं।

18 से कम उम्र की 700 बच्चियां हर साल शिकार
उदाहरण के तौर पर 2016 के आंकड़े देखें। दुष्कर्म के कुल 3656 केस दर्ज किए गए। इनमें से छह मामलों में तो पीड़िताएं इतनी छोटी थीं कि वे ठीक से बता भी नहीं सकती थीं कि उनके साथ हुआ क्या है? ये वो मामले थे, जिनमें छह साल तक की बच्चियों से दुष्कर्म किया गया था। इन्हीं में से 37 मामले ऐसे थे, जब दरिंदों ने 6 से 12 साल तक उम्र की बच्चियों को निशाना बनाया। इसी साल 195 मामले ऐसे थे जब 12 से 16 साल की बच्चियों से रेप की घटनाएं हुईं। इसी तरह 529 मामलों में 16 से 18 साल की बच्चियों से दुष्कर्म किया गया। 2879 केस ऐसे थे, जब 18 साल से ऊपर की युवतियों से दुष्कर्म किया गया।

147 मामले ऐसे, जहां पिता, दादा, भाई आरोपी
2016 के दुष्कर्म के मामलों के आंकड़ों को देखें तो डराने वाली स्थिति सामने आती है। 147 मामले ऐसे थे, जहां सबसे नजदीकी रिश्तेदार यानी पिता, दादा, भाई या बेटा ही दुष्कर्म के आरोपी थी। 139 मामलों में इनसे इतर पारिवारिक सदस्य आरोपी पाए गए। दुष्कर्म की 269 घटनाओं को उन रिश्तेदारों ने अंजाम दिया जो पीडि़ता के घर अक्सर आया जाया करते थे। 704 मामलों में पड़ोसी आरोपी पाए गए। इसी तरह यह रिपोर्ट साथी कर्मचारियों पर भी भरोसा खत्म करती है। 46 मामलों में मालिक या सहकर्मी के खिलाफ केस दर्ज हुआ। सिर्फ 30 मामले ही ऐसे थे जब किसी अनजान ने पीड़िता से दुष्कर्म किया।

यह सच है कि अगर...पॉक्सो अदालतें हर जिले में खुल भी जाए तो भी हमारे घरों और रिश्तों के हाथों को सुरक्षित नहीं बना सकतीं, लेकिन ये अदालतें ही हैं जो न्याय का भरोसा देती हैं...। दुष्कर्मी की आंखों में आंखें डालकर उन्हें सज़ा के अंजाम तक पहुंचाने की ताकत देती हैं। अगर हम पीड़िताओं को इंसाफ का हक भी नहीं दे सकते तो शायद हमें मानवीय कहलाने का कोई अधिकार नहीं है।

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