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बीकानेर. होली का दिन। रंगाें से सराबाेर शहरवासियाें के बीच निकलती बारात। बारात में दूल्हे सहित एक भी बंदा ऐसा नहीं हाेता जाे सूट बूट में नजर आए लेकिन इसके बाद भी विवाह की रस्में निभाई जाती है। महिलाएं दूल्हे काे पाेखने की रस्म निभाते हुए मंगल गीत भी गाती है और ताे और बारातियाें के लिए चाय नाश्ते की व्यवस्था भी करती है। इस बारात और दूल्हे के साथ वे सारी रस्में निभाई जाती हैं जाे शादियाें में हाेती है, लेकिन उसे नहीं मिलती ताे बस दुल्हन।
हम बात कर रहे हैं होली के दिन हर्ष जाति की ओर से निकाली जाने वाली बारात की। इस बारात की खासियत यह है कि इसमें जाे दूल्हा बनता है वह 350 सालाें से एक ही घर (बनवाली हर्ष परिवार का घर) में तैयार हाेने के लिए पहुंचता है। यहां से तैयार होने के बाद यह दूल्हा बीकानेर में ही मोहता चौक के आनंद भैरव काे धोक लगाता है। फिर रवाना होती है बारात। करीब दो घंटे तक सगे संबंधियों के अलावा व्यास और दम्माणी जाति के घरों में इस दूल्हे को स्वागत की रस्में (पौखने) निभाई जाती है। इसके बाद दूल्हा वापस हर्षों के चौक में पहुंचता है। व्यास परिवार की ओर से बारात का स्वागत सत्कार किया जाता है। बता दें कि बारात से पहली रात को गणेश परिक्रमा निकाली गई। इससे पहले व्यास जाति की ओर से हर्ष जाति के लोगों के बारात लाने का निमंत्रण दिया।
15 जगहों पर निभाई जाति है पौखने की रस्म
होली के दिन निकलने वाली हर्ष जाति की बारात के दूल्हे को 15 घरों में स्वागत की रस्में निभाई जाती हैं। जिसमें किकाणी व्यास, लालाणी व्यास जाति के अलावा दम्माणी जाति के घर भी शामिल है। इस दूल्हे को नारियल और रुपए देकर रस्में निभाई जाती हैं।
एडवोकेट हीरालाल हर्ष और गिरिराज हर्ष ने बताया कि हर्ष और व्यास जाति के लोग सांप्रदायिक सौहार्द और सद्भाव को बढ़ाने के लिए यह परंपरा निभा रहे हैं। इसमें हर्ष जाति के दूल्हे को व्यास जाति के घरों में पौखने की परंपरा निभाई जाती है। पुरानी किवदंती के अनुसार हर्षों के दूल्हे को दम्माणी जाति के लोग भी अपने घर पर स्वागत की रस्मों की परंपरा निभा रहे हैं।
इन रास्तों से गुजरती है बारात
मोहता चौक के आनंद भैरव से रवाना होकर बारात हर्षों के चौक, मूंधड़ा चौक, दम्माणी चौक, लालाणी व्यासों का चौक, मोनावत पुरोहित की गली होते हुए किकाणी व्यासों का चौक होते हुए वापस हर्षों के चौक पहुंचकर बारात खत्म हो जाती है।
कंटेंट/फोटोज- परिमल हर्ष
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