अलवर / अंबेडकर के पोते बोले- 15 अगस्त को काला दिन मनाने का जो ये सिलसिला है इसकी शुरुआत आरएसएस ने की

प्रकाश अंबेडकर प्रकाश अंबेडकर
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प्रकाश अंबेडकरप्रकाश अंबेडकर

  • सीएए एनपीआर एवं एनआरसी के विरोध में शनिवार को अलवर में जनसभा आयोजित की गई
  • 'संविधान की धारा 4 और 5 कहती है कि जिसने भारतवर्ष में जन्म लिया है उसकी नागरिक्ता जन्म से मिलती है'

Dainik Bhaskar

Feb 15, 2020, 04:15 PM IST

अलवर. संविधान एवं लोकतंत्र बचाओ मोर्चा की ओर से सीएए एनपीआर एवं एनआरसी के विरोध में शनिवार को जेल चौराहे के पास स्थित कर्बला मैदान में जनसभा आयोजित की गई। जनसभा को भारत रतन डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर भी पहुंचे। उन्होंने कहा कि जो यहां पर जन्म है। जिनके पुरखों ने यहां पर जन्म लिया है उन सभी का देश है। भाजपा और आरएसएस का देश बिल्कुल नहीं है। असलियत इनकी देखी जाए तो 15 अगस्त को काला दिन मनाने का जो ये सिलसिला है इसकी शुरुआत आरएसएस ने की है। 

उन्होंने कहा कि 1949 तक इन्होंने काला दिवस मनाया। जिसके बाद 1950 में काला दिन न मनाए इसके लिए इन्हे जेल में डाला गया था। उस वक्त के गृह मंत्री सरदार पटेल ने इनसे कहा अगर काला दिन 1950 में मनाओगे तो जिंदगीभर जेल में डाल देंगे। तब जाकर इन्होंने लिखकर दिया कि हम इस देश के संविधान, तिरंगे झंडे अशोक चक्र के साथ, 15 अगस्त इस देश की स्वतंत्रता का दिवस है। ये लिखने के बाद इन पर से बंदिश हटाई गई थी। ये इनकी असलियत है।  

'भारत वर्ष में जन्म लिया है उसकी नागरिक्ता जन्म से मिलती है'

प्रकाश अंबेडकर ने कहा कि एनआरसी की आज वे वक्त में जरूरत क्या है। 70 साल बाद अगर कोई राजनैतिक पार्टी ये कह रही है कि हम किसी को नागरिक्ता बहाल करने जा रहे हैं तो ये संविधान के खिलाफ है। संविधान की धारा 4 और 5 कहती है कि जो भारत वर्ष में जन्म लिया है उसकी नागरिक्ता जन्म से मिलती है। जहां ये प्रावधान है। वहां दुबारा नागरिक्ता देने की बात कैसे कर सकते हैं। मैं ये समझता हूं कि आरएसएस और भाजपा की सरकार की मनशा कुछ अलग है। गोलवलकर की एक किताब है जिसमें उन्होंने भारत का नक्शा कैसा होना चाहिए। समाज की व्यवस्था कैसी होनी चाहिए उसका पूरी तरह विवरण किया है। उनका विवरण मनू वादी व्यवस्था है। दूसरी बात उसमें ये है कि और कोई धर्म के लोग जैसे- मुस्लिम, जैन, सिख और इसाई इन सभी धर्मों को भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं है। अगर उनको रहना है तो दुय्यम नागरिक की तरह रहना है। 

'1 अप्रेल से परिस्थितियां बेकाबू हो सकती है'

जो अधिकार सरकार देगी वहीं अधिकार दिया जाएगा। जो विधान ने अधिकार दिया है वो छीना जाएगा। मतलब ये नई विचारधारा की सरकार बन चुकी है। वो अपनी विचारधारा देश पर लागू करने जा रही है। मैं समझता हूं कि 1 अप्रेल के बाद मुझे परिस्थितियां बेकाबू होते हुए दिखती है। कोशिश हमारी ये है कि 4 मार्च को दिल्ली के कई संगठनों ने जंतर-मंतर पर आंदोलन आयोजित किया है। उम्मीद ये है कि लाखों की भीड़ वहां पर होगी। जहां से चर्चा करने की शुरुआत होगी। जहां सरकार चर्चा करने के लिए तैयार नहीं है। वहां एक-दूसरे के सामने खड़े होने की नौबत आ चुकी है। जैसे शाहीन बाग 50 दिन होने के बाद भी टस से मस नहीं हो रहा है। उसी प्रकार मोदी जी ये कह रहे हैं हम एनआरसी लागू करेंगे, लेकिन एनआरसी लागू करने से पहले नेश्नल पॉपुलेशन रिस्ट्रेशन मतलब जनसंख्या का रिस्ट्रेशन करना इसकी हम लोग शुरुआत करेंगे। किसी ने सुष्मा स्वराज जी की बात सदन में सुनी हो तो उन्होंने ये कहा था एनआरसी से पहले का स्टेप एनपीआर ह। मैं ये समझता हूं कि कोई भी अपनी आजादी खोना नहीं चाहता है। इसलिए इस देश में शांति और अमन बना रहे। वरना 1 अप्रैल के बाद क्या होगा पता नहीं।

कंटेंट- मनीष बावलिया

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