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आत्महत्या करने की धमकी देते किसान का वीडियो वायरल, बोला- पानी नहीं मिला तो पांच किसान नहर में कूदेंगे

आत्महत्या करने की धमकी देते किसान का वीडियो वायरल, बोला- पानी नहीं मिला तो पांच किसान नहर में कूदेंगे

Danik Bhaskar | Jan 23, 2018, 12:36 PM IST
राजस्थान के  बींझबायला गांव का राजस्थान के बींझबायला गांव का

बींझबायला(राजस्थान). रेगुलेशन के असमान वितरण से परेशान हरखेवाला के पांच किसानों ने आत्महत्या की धमकी दी है। इन किसानों ने जैसे ही सुसाइड नोट और वीडियो सोशल साइट पर वायरल किया, पुलिस प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। उधर, पूरे कस्बे में यह वीडियो आग की तरह फैल गया और दिनभर यही बात चर्चा का विषय बनी रही। पुलिस ने पांचों किसानों को थाने बुलाकर शांतिभंग में गिरफ्तार किया जिन्हें बाद में छोड़ दिया। फिर सिंचाई व प्रशासन के उच्चाधिकारियों को इसकी जानकारी दी। जानें पूरा मामला...


- जब इन किसानों को थाने बुलाया तो आसपास के अनेक किसान प्रतिनिधि भी मौके पर पहुंच गए। दोपहर बाद ये किसान बींझबायला उपतहसील में एकत्र हुए।
- बाद में तय किया गया कि मंगलवार को उपतहसील पर किसान प्रदर्शन करेंगे। इन किसानों का कहना है कि पिछले 18-20 महीने हो गए हैं शनि-रवि और साेमवार के किसानों के दो बारियां नहीं मिल पाई हैं जबकि रेगुलेशन सही हो तो एक साल में दो या तीन बारी तो दो बार लग ही जाती है।
- किसानों ने एक कागज पर भी लिखा कि अगर क्षतिपूर्ति नहीं की गई तो किसान गंगनहर में डूबकर जान देंगे। उधर, जल संसाधन रेगुलेशन खंड से मिले चार्ट के अनुसार 16 अक्टूबर से 16 जनवरी तक 90 दिनों के दौरान 57 दिन एलएनपी में पानी छोड़ा गया दिखाया है। इसमें से रविवार, सोमवार एवं शनिवार को आठ-आठ दिन, मंगलवार को 9 दिन तथा बुधवार, गुरुवार एवं शुक्रवार को साढ़े आठ-आठ दिन नहर में पानी प्रवाहित दिखाया है।

- चक 44 एलएनपी, हरखेवाला तहसील पदमपुर, जिला श्रीगंगानगर गंगनहर। एलएनपी माइनर से पांच जनवरी को कंपलेंट किया था 181 पर। उस पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है और हर बारी हमारी बारी पिट रही है। जो आज रविवार को सुबह दस बजे किसान के खेत में पानी बंद हो गया जो अभी खाळे में तीन ईंच पानी चल रहा है। हर बारी 18 माह से हमारी बारी पिट रही है। और प्रशासन इस पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। और ना ही हमारी कोई सुनवाई हो रही है। और कल गंगानगर भी गए थे अधिकारियों के पास में वो भी आनाकानी कर रहे हैं अगर हमारी ये यही समस्या रही, तो हम पांच किसान मिलकर के सोमवार के बाद आने वाले शुक्रवार, शनिवार व रविवार को हमारी बारी का क्षतिपूर्ति नहीं दिया गया तो पांच किसान मिलकर आत्महत्या करेगे और वो गंगानगर कालूवाला हैड पर डूब कर जान देंगे। चक 44 एलएनपी कृष्णलाल शिकायत कर्ता... (जैसा कि एक किसान वीडियो में बोल रहा है)


आरोप- सिंचाई अधिकारी कागजों में दिखाते हैं कि नहर चल रही है, हकीकत- खेत में पहुंचता ही नहीं पानी, किसानों की सुनवाई नहीं


किसानों का कहना है कि सिंचाई अधिकारी झूठ बोलते हैं और कागजों में नहर चली दिखा देते हैं जबकि खेत में पानी पहुंचता ही नहीं है। आरोप लगाया कि सिंचाई अधिकारी पानी बेचते हैं। कहा, अधिकारी भेदभाव करते हैं। सवाल उठाया कि आखिर हर बार शनि-रवि और सोमवार तक ही पानी कैसे घट जाता है जबकि मंगल-बुध व गुरुवार पर सिंचाई अधिकारी पूरे मेहरबान दिख रहे हैं। किसानों का कहना है कि इस समस्या से वे कलेक्टर और सिंचाई अधिकारियों को अवगत करा चुके हैं पर कोई सुन ही नहीं रहा है।

किसानों की पीड़ा: बारियां पिटती हैं, रेगुलेशन सही नहीं होता


- किसान कृष्णलाल ने कहा, सिंचाई अधिकारियों का रेगुलेशन ही सही नहीं होता। बकौल कृष्ण, उसकी रविवार को बारी है और पिछले 28 दिन में महज आधी बारी पानी लगा है। कहा, अकसर ऐसा होता है कि शनिवार-रविवार और अाधे सोमवार के किसानों की बारियां पिट रही हैं।
- रतनलाल बोले- हाल ही में एलएनपी को 12 दिन चलाकर बंद कर दी। दो दिन और चला देते तो शनि-रवि के किसान नहीं पिटते। कहा, बीस माह हो गए जब उनके खेत में दो बारी पानी लगा था। पूछने पर अधिकारियों का एक ही तर्क होता है, पीछे से पानी घट गया, हम क्या करें?
- धर्मपाल खुडिया का कहना है कि उनके खेत में लास्ट बार 17 दिन पहले पानी पहुंचा था। रबी तो जैसे तैसे ट्यूबवैल से पका रहे हैं, खरीफ में हमारी फसल बर्बाद हो गई थी। अधिकारियों से शिकायत की तो कहने लगे कि हमने झारा दे दिया लेकिन हमारे खेत में तो पानी पहुंचा ही नहीं।
- साहबराम का कहना है कि18-20 माह से दो बारी आई ही नहीं, जबकि मंगल-बुध के किसानों को सिंचाई विभाग फायदा पहुंचा रहा है। रेगुलेशन के हिसाब से चले तो साल में ज्यादा नहीं तो दो या तीन बार तो दो बारी आनी चाहिए थी लेकिन यहां तो पूरी एक भी नहीं मिल रही।
- किसान रामदत्त ने कहा, ट्यूबवैल का एक घंटे का किराया 600 रुपए है। कोई मेरे खेत में जाकर देखे, जौ की फसल की अब तक मैं कोर नहीं दबा पाया। समझ नहीं आ रहा कि फसल पकाएं तो कैसे? अधिकारी मनमानी करते हैं, किसानों की पीड़ा सुनने को कोई भी तैयार नहीं है।