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दड़ा में हुए सैकंडों खिलाड़ी शामिल, एक दर्जन से अधिक गांवों के लोग थे दर्शक, छतें बनीं दर्शकदीर्घा, महिलाएं-बच्चे बढ़ाएंगे खिलाड़ियों का उत्साह

दड़ा में हुए सैकंडों खिलाड़ी शामिल, एक दर्जन से अधिक गांवों के लोग थे दर्शक, छतें बनीं दर्शकदीर्घा, महिलाएं-बच्चे बढ़ाएंगे खिलाड़ियों का उत्साह

Aadi Dev Bharadwaj | Last Modified - Jan 14, 2018, 04:29 PM IST

बूंदी। मकर संक्रांति पर जहां सभी जगह पतंगबाजी का माहौल था वहीं बूंदी जिले के तालेड़ा के रियासतकालीन गांव बरूंधन में दड़ा खेला गया। यह राजाओं के जमाने से खेला जा रहा है। पारस्परिक सौहार्द का प्रतीक एवं आधुनिक फुटबाल का जनक माना जाने वाला ग्रामीण अंचल का यह खेल अद्वितीय विशेषताओं के कारण सदियों से अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। दड़ा बिना रेफरी के जनसैलाब द्वारा पूर्ण जोश के साथ खेला जाने वाला स्व अनुशासित खेल है। मैच में ग्रामीणों की टीम विजयी रही। जानिए और इस बारे में ....

- लक्ष्मीनारायण मंदिर भगवान के आंगन को साक्षी मानते हुए सैकड़ों खिलाड़ी, गुत्थम-गुत्था होकर 50 किलो वजनी दड़ा (फुटबाल) पर पिल पड़े। उसके बाद जोश व उमंग के साथ दड़ा शुरू हुआ। खेल के दौरान धक्का-मुक्की व खींचतान हुई व खेल में कई लोगों की पगड़ियां उछलीं तो कई गिरे भी। उन्हें चोंट भी आईं, लेकिन इससे आपस में कोई बैर नहीं हुआ।

छतें बनीं दर्शकदीर्घा, महिलाओं ने बढ़ाया हौसला

- लक्ष्मीनारायण मंदिर के आंगन में बने मकान दर्शकों के लिए स्टेडियम का काम करते हैं। महिलाओं और बच्चों से छतें खचाखच भरी रहीं। रंग-बिरंगे परिधानों में सजी-धजी महिलाएं छतों से पुष्प वर्षा कर खेलने वालों का उत्साह बढ़ाती रहीं। इस दौरान विरोधी टीम की महिलाआें के खिलाड़ियों को चुनौती देने पर खिलाड़ी पूरे जोश के साथ खेलते रहे।

दड़े को दिया अंतिम रूप
- रविवार को खेले जाने वाले दड़े को शनिवार तक अंतिम रूप दे दिया गया था। दड़ा बुनने वाले 91 वर्षीय बुजुर्ग देवलाल कुशवाह ने अपनी मंडली के साथ दड़े को रस्सी व डोरी के साथ अंतिम रूप दिया। दड़ा को अंतिम रूप देने वाली मंडली में बजरंगलाल सैनी, रामधन मेहर, भीमराज सैनी, बबलू शर्मा, योगेश राठौर, दुर्गा सैनी, राजू सोनी मौजूद रहे।

दड़ा परंपरा का यह है इतिहास
- हाड़ा वंश के श्यामसिंह हाड़ा ने बताया कि 700 साल पहले यहां पर हाड़ा वशं के 60 परिवार रहते थे। उनके जोर-आजमाइश के लिए इस खेल की शुरूआत की गई।

- 50 किलो वजनी टाट, बारदाने, रस्सी से बनी फुटबाल के आकार की गेंद को दड़ा कहते हैं। इसके लिए आसपास के गांवों के लोगों को खेलने के लिए बुलाया जाता था। इसमें एक टीम में हाड़ा वंशज और दूसरी टीम में आस-पास के गांवों के लोग हिस्सा लेते थे।

- वर्तमान में हाड़ावंश का एक ही परिवार रह गया, लेकिन परम्परा आज भी कायम है। आज भी एकतरफ हाड़ा वंशज और मोहल्ले वाले और दूसरी तरफ आसपास के गांव वाले मौजूद रहते हैं।

ऐसे खेला जाता है
- खेल में मौजूद सैकड़ों खिलाड़ियों द्वारा दड़ा गांव के बीचों-बीच रखा जाता है और उसे पैरों से इधर-उधर धकेला जाता है। इसमें शर्तानुसार दड़े को अपने पाले में लाने वाले को विजेता घोषित किया जाता है।
- इस खेल को देखने के एक दर्जन से अधिक गांवों के लोग शामिल हुए। इसमें बरूंधन, नावघाट का टापरा, धनातरी, नमाना, सीतापुरा, गादेगाल, गुमानपुरा, अंधेड़, मालीपुरा, लोईचा, लक्ष्मीपुरा, तालेड़ा, भरता बावड़ी, भंवरिया कुआं सहित अनेक गांवो के लोग दड़ा महोत्सव आनंद उठाते हैं।

फोटो : रवि विजयवर्गीय

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