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बेजुबानों के लिए रोजाना 70 किलो रोटियां तो पक्षियों के लिए ढाई क्विंटल चुग्गा

बेजुबानों के लिए रोजाना 70 किलो रोटियां तो पक्षियों के लिए ढाई क्विंटल चुग्गा

Aadi Dev Bharadwaj | Last Modified - Dec 19, 2017, 09:53 AM IST

बीकानेर। छोटी काशी के नाम से मशहूर बीकानेर में मनुष्यों के साथ-साथ निरीह पशु-पक्षियों के लिए भी खाना तैयार किया जाता है। दो जगहों पर रोज पशुओं के लिए रोटियां तैयार की जाती हैं और 20 किलोमीटर दूर तक इन्हें भेजा जाता है। वहीं लक्ष्मीनाथ मंदिर परिसर में पक्षियों के लिए हर दिन ढाई क्विंटल चुग्गा डाला जाता है। इन सब की व्यवस्था लोग अपने स्तर पर करते हैं, किसी से सहयोग नहीं मांगते। वहीं इनको देखने वाले स्वयं ही इससे जुड़ते जाते हैं। जानिए और इस बारे में ....

- बैदों के चौक और बेगाणियों के चौक में पशुओं के लिए रोटियां बनाई जाती हैं। एक जगह बाजरे की रोटियां तो दूसरी जगह गेहूं के आटे की रोटियां तैयार होती हैं। यहां से लोग रोटियां ले जाते हैं। इस दौरान एक ही कमेंट सुनने को मिलता है ‘सांझे चूल्हे में सबका सीर’।

- दिवाली के बाद से बैदों के चौक में शुरू होने वाले रतना महाराज के धूणे के साथ शुरू हो जाता है निरीह पशुओं के लिए रोटियां बनाने का दौर। यह दौर होली तक निर्बाध रूप से चलता है। शुरुआत में 15 किलो बाजरी के आटे से शुरू होने वाला काम दिसंबर और जनवरी में हर दिन 40 से 45 किलो आटे तक पहुंच जाता है।
- खास बात यह है कि बाजरा कौन पहुंचाता है, लकड़ियों की व्यवस्था कैसे होती है यह किसी को पता नहीं होता। कुछ लोग अपने आप चक्की पर बाजरा पहुंचा जाते हैं और वहां से हर दिन आटा धूणे पर पहुंचता रहता है। सायं साढ़े सात बजे बालकों की टोली जिसमें राजेश जोशी, सुनील, जतिन, राधेश्याम पहुंचते हैं और सफाई में जुट जाते हैं। सफाई जब तक पूरी होती है तब तक जयकिशन जोशी, गोपाल सेवग, सत्यनारायण व्यास, कालू कचौली वाला, विजय कुमार मूंधड़ा, ज्ञानूजी हर्ष, शिवशंकर सेवग, शिवकुमार जोशी, गणेश मारु, विजय आचार्य की टीम पहुंच् जाती है। टीम के कुछ सदस्य आटा गूंथते हैं तो कुछ रोटियां सेकना शुरू कर देते हैं। रोटियां पूरी होते ही इनके पैकेट बनाने शुरू कर दिए जाते हैं। तैयार रोटियां के करीब 20 पैकेट बनते हैं।

शहर में 25 किमी तक पशुओं के लिए पहुंचाई जाती है रोटियां

- बैदों के चौक में तैयार होने वाली रोटियों के पैकेट शहर के 25 किलोमीटर की एरिया में पहुंचते हैं। सरकारी कर्मचारी, मजदूर, महिलाएं और अलग-अलग लोग अपने अपने क्षेत्रों में ले जाते हैं। रात को ये पैकेट लेकर रख लेते हैं और सुबह पशुओं को देते हैं। शहर से 25 किलोमीटर दूर कोडमदेसर, नाल, बीछवाल, गंगाशहर, भीनासर, श्रीरामसर, लक्ष्मीनाथ मंदिर, गोपेश्वर बस्ती सहित आसपास के क्षेत्रों में ये रोटियां ले जाई जाती है। वहीं बेगानियां के चौक में बनने वाली रोटियां शहरी क्षेत्र में ही रात के समय की आवारा पशुओं को वितरित कर दी जाती है।

रोज 2.50 क्विंटल बाजरे का दिया जाता है चुग्गा

- लक्ष्मीनाथ मंदिर परिसर में बरसों से कबूतरों के लिए चुग्गे की व्यवस्था के तहत हर रोज 2.50 क्विंटल बाजरे और मोठ का चुग्गा दिया जाता है। इस व्यवस्था का संचालन नियमित रूप से मंदिर आने वाले दर्शनार्थियों के जिम्मे ही है। लोग खुदबखुद बाजरे और मोठ की बोरियां रखवा देते हैं जिनके लिए मंदिर के ही एक कमरे को गोदाम का रूप दे दिया गया है जो ठसाठस भरा रहता है।

घायल पक्षियों का इजाज भी करते हैं
- हर रोज करीब चार घंटे कबूतरों के जमावड़े में कुछ ऐसे कबूतर भी आते हैं जो मांजे या अन्य कारणों से घायल होते हैं। लहुलुहान हालत में आए कबूतरों का इलाज वहां व्यवस्था संभालने वाले लोग करते हैं और ठीक होकर उड़ने लगें तब तक उनकी देखभाल करते हैं। वहीं जब तक कबूतर चुग्गा चुग रहे होते हैं तब तक कुत्ते या अन्य पशु वहां नहीं आएं इसके लिए भी मुस्तैद रहते हैं ताकि कबूतर सुरक्षित होकर पेट भर सकें।

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फोटो : परिमल हर्ष

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Web Title: bejubaanon ke liye roj pkate hain 70 kilo rotiyaan to pksiyon ke liye dhaaee kvintl chugagaaa
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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