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Dainik Bhaskar

Jan 25, 2018, 07:18 PM IST
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सं जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सं

जयपुर. गुरुवार के दिन जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मशहूर हास्य कवि संपत सरल ने दैनिक भास्कर डॉट कॉम के एडिटर अनुज खरे के साथ व्यंग पर चर्चा की। इस दौरान उन्होंने कह कि मैं गद्य पढ़ता हूं कविताएं बहुत पहले पढ़ता था।' यहां पर उनकी 6 रचनाएं खास रहीं। जानें कौनसी थी वो रचनाएं...

इसके आगे उन्होंने अपनी रचना प्रतिशोध सुनाई


- संपत सरल ने अपने सेशन की शुरुआत देश के अच्छे दिनों पर तंज कसते हुए कहा कि 'जिन्होंने अच्छे दिन का वादा किया था उन्हे याद दिलाओ तो वो भी हसने लगते हैं।'


उसकी शादी हुए सप्ताहभर हुआ था।
मैंने सलाह दी, "दोस्त, सिनेमा देखो, सैर-सपाटा करो। पत्नी को लिए-लिए क्या मंदिर-मंदिर भटकते फिरते हो?"
उसने कहा, "सुना है जोड़े ईश्वर बनाता है। बस, उसी को ढूंढना है।"

इसके बाद संपत सरल ने अपनी लघु कथा सदाचार सुनाई

पिता बिजली विभाग में है और पुत्र जलदाय विभाग में। दोनों ने शहर की एक कॉलोनी में बराबर ही में अपना-अपना नया मकान बनवाया है। पिता को मकान में नल कनेक्शन चाहिए और पुत्र को बिजली कनेक्शन। जबतक पिता घूस नहीं देगा, बेटा उसके यहां नल नहीं लगने देगा। जबतक बेटा घूस नहीं देगा , पिता उसके यहां बिजली कनेक्शन नहीं होने देगा।

पिता-पुत्र में जूतम-पैजार चाहे हजार होती हो, किन्तु भारतीय संस्कारों में अभी इतनी गिरावट नहीं आई है कि पिता-पुत्र ही परस्पर रिश्वत मांगने लगें। सो, बेटा बिजली की चोरी करता है और बाप पानी की।

जिसके बाद उन्होंने अकबर पर लिखी अपनी लघु कथा सुनाई। जिसका नाम है हें हें हें हें....

मेवाड़ के पराभव के पश्चात् ज्योंही मुगल सम्राट जलाल उद्दीन मोहम्मद अकबर सम्पूर्ण हिन्दुस्तान का अधिपति हुआ, त्योंही कवि कुंभनदास ने अब्दुर्रहीम खानखाना को फोन मिलाया।

रहीम ने पहली ही घंटी में फोन उठाया, "कहो कुंभनदास जी, आज हमारी याद कैसे आई?"
फारसी, संस्कृत, हिन्दी के उद्भट विद्वान व कवि, आलमपनाह अकबर के मुख्य सेना नायक और नवरत्नों में से एक, रहीम के मुख से बिना किसी पूर्व परिचय के यों अपना नाम सुनकर कुंभनदास को विस्फोटक आश्वस्ति हुई कि जब रहीम की फोनबुक में नाम फीड है, तो गुडबुक में भी हुआ ही समझो।
कुंभनदास ने पूछा, "आजकल बादशाह सलामत दिल्ली में हैं, आगरा में हैं कि फतेहपुर सीकरी में हैं?"
रहीम, "जी, फतेहपुर सीकरी में हैं।"
कुंभनदास, "तो आलमताब के सानिध्य में जमाओ शीघ्र ही सीकरी में कविसम्मेलन?"
रहीम, "लेकिन कुंभनदास जी, जहांपनाह तो कविता वगैरह समझते ही नहीं हैं?"
कुंभनदास, "यह तो और अच्छी बात हुई।...... हैलो, सीकरी में कविसम्मेलनों का सिलसिला सदैव के लिए चल पड़ेगा। बस, आप तो शहंशाह हुजूर तक यह रहस्य पहुंचादो कि काठ से बंधकर ही पत्थर तैर सकता है। कवि ही की कलम में वह धार होती है कि जघन्य नर संहारों को भी दुनिया धर्मयुद्ध मानने लगती है। कवि ही की वाणी में वह जादू होता है कि राजा की प्रत्येक मूर्खता को उसकी 'लीला' सिद्ध करदे।"
रहीम, "लेकिन कुंभनदास जी, आप तो कभी अपने एक पद में 'संतन को कहा सीकरी सों काम' कह चुके हैं?"
कुंभनदास, "वह तो महाराणा प्रताप ने बेटे अमर सिंह के जन्मोत्सव पर कविसम्मेलन में बुला लिया था, सो कहना पड़ा। हें हें हें हें।"

एक आदर्श भारतीय गांव

आज भी जो यह मानते हैं की भारत की आत्मा गांव में बसती है , मेरे ख्याल में उन्होंने गांव उतने ही देखे हैं जितनी की आत्मा।
जिस आदर्श गांव का जिक्र आज मैं करने जा रहा हूँ वैसे तो वह राजधानी दिल्ली से दशेक किलोमीटर पश्चिम में है।
चूँकि रास्ते में शराब के कई ठेके पड़ते हैं अतः यह घटती बढ़ती रहती है।
कहते हैं उक्त आदर्श गांव किसी जालिम सिंह नाम के व्यक्ति ने बसाया था ,
जो की निहायत ही ईमानदार और परोपकारी डाकू थे, क्योंकि निर्वाचित नही थे।
हालाँकि बाद में उन्होंने भी डाकू जीवन से वीआरएस लेकर पॉलिटिक्स ज्वॉइन कर ली थी।
उनको यह समझ आ गया होगा कि
एक डाकू को जिनके यहाँ डकैती करने जाना पड़ता है
चुनाव जीत लेने पर वे ही लोग घर बैठे दे जाते हैं।

यों भी अपराध व राजनीती में वोटिंग का ही अंतर तो रह गया है
संसद पर जिन आतंकियों ने हमला किया था सुरक्षा प्रहरियों ने उन्हें गोली मारने से पहले निश्चित ही कहा होगा
कि मानते हैं आप लोग बहुत बड़े अपराधी हैं ,लेकिन चुनाव जीते बिना अंदर नही जाने देंगे।
आदर्श गांव में दशों दिशाएं तीनो मौसम बारहों महीने व सातो बार होते हैं
बस एक तो गांव के उत्तर में हिमालय नही है और तीनो तरफ से समुद्र से घिरा हुआ नही है।
गांव वालों का अगर डाकू जालिम सिंह आज जीवित होते तो यह दोनों चीजें भी गांव में होती।

गांव के लोग किफायती इस हद तक हैं की मिस्ड काल भी अपने फोन से नही करते हैं।
और दरियादिल ऐसे की करने के बाद फोन करके पूछते रहते हैं की मिस्ड कॉल मिला क्या।
गांव में कुल तेरह पर्यटक स्थल हैं तीन शराब के ठेके , एक मंदिर ,
एक प्राइमरी स्कूल ,एक पुलिस चौकी , दो कुएं और पांच शमशान घाट।

सरकारी ठेको के बावजूद हस्त निर्मित शराब को ही वरीयता दी जाती है
ताकि ग्लोब्लाइजेशन के इस भीषण दौर में आंचलिकता बरकरार रहे।
गांव के अधिकांश लोग शराब पीते हैं कई लोग नही भी पीते हैं।
जो नही पीते हैं वो पीने वालो को समझते बुझाते रहते हैं।
उनके समझाय से जब पीने वाले नही समझते हैं तो दुखी होकर वे भी पीने लगते हैं

लोगो में सरकारी नौकरियों के प्रति बड़ा मोह हैं ,
सबका प्रयास रहता है कि काम ऐसा हो जिसमे काम न हो ,
जहाँ तक काम का सवाल हैं मेहनत करने वाले को मजदूरी नही मिलती।
और जिसे मजदूरी मिल जाती है वो मेहनत बंद कर देता है ,
सबके आपसी सम्बन्ध गठबंधन सरकारों जैसे हैं अर्थात स्वार्थ ही दो लोगो को जोड़ता है।
उम्र का फसल भी रिस्तो में बाधक नही बनता दिन में बेटे का क्लासफेलो होता है,
शाम को वही बाप का ग्लासफेलो होता है।

गांव में जबसे हैंडपंप लगे हैं दोनों कुएं शर्त लगाकर कूदने के काम आ रहे हैं
स्कूल उतनी ही देर चलता है जितनी देर मिडडे मील चलता है।
पुलिस चौकी को लेकर मतभेद हैं की अपराध बढ़ने से चौकी खुली है या चौकी खुलने से अपराध बढे हैं।

पांच श्मशान घाटों से स्वंय सिद्ध है कि गांव में पांच जातियां रहती हैं। कहा जाता है कि मनुष्य के मरने के बाद भी उसकी जाती नहीं मरती।
एक दफा क जाती के लोगों ने अपना शव ख जाती के श्मशान में जला दिया। ख जाती वालों ने तुरंत अपना एक व्यक्ति मारा और उसे क जाती के श्मशान में जला कर बदला लिया।
अंतह लोकल विधायक ने दोनों जाती के एक-एक लोग मारवाकर उनके अपने-अपने श्मशानों में जलवाए तब जाकर शांति हुई।


सोशल मीडिया पर लिखा अपना एक लेख सुनाया।

यदि किसी ने कुछ एक अक्षरों तक की मैकिंग कर डाली हो तो उसे फेंकने के लिए ट्विटर से बहतर जरिया नहीं है...
जो कुछ नहीं कर सकता है वो भी ट्वीट कर सकता है। एक बार जो ट्वीट करने लगता है वो कुछ नहीं कर सकता..
मैने तो सोशल मीडिया का लोहा उस दिन मान लिया जब एक सज्जन ने मैरी एक ही क्लिप को साल में सौ बार सुना और नीचे गाली लिखी-नालायक हैसंपत सरल जिसने सालभर से रचना को छोड़ा कपड़े तक नहीं बदले।

आखिर में अपने एक गद्द के साथ संपत सरल ने इस सेशन का अंत किया। जिसका नाम है 'बातचीत'

भारत-पाकिस्तान ने जब कई दिनों तक बात नहीं की तो अमेरिका ने भारत से बातचीत की
भारत ने अमेरिका सलाह को आदेश मान पाकिस्तान से बातचीत की कि बातचीत करनी चाहिए
पाकिस्तान को डाउट हुआ कि भारत ने हमसे बातचीत के विषेय में भी बातचीत क्यों की
उसने भारत की बातचीत को लेकर तुरंत अमेरिका से बातचीत की
और क्या बातचीत की साहब भारत से क्या बातचीत करें वो तो बातचीत के अलावा कुछ करता ही नहीं
अमेरिका ने बातचीत में समझाते हुए बातचीत की आप दोनों का आपसी मसला है तो आप दोनों आपस में ही बातचीत करो।
इस प्रकार तीनों में बातचीत हो चुकी तो भारत और पाकिस्तान ने एक दूसरे से बातचीत की।
पाकिस्तान ने बातचीत का विषय पूछा, भारत ने कहा किसी भी फाइनल बातचीत तक पहुंचने के लिए जरूरी है कि हम लगातार बिना विषय का बातचीत करते रहें।
बिना किसा बातचीत का ही सु परिणाम कहो पकिस्तान बातचीत के बाद भी खूनखराबा नहीं छोड़ता और भारत में खूनखराबे के बाद भी बातचीत...
पाकिस्तान ने बातचीत के लिए भारत से पूछा आप बातचीत के लिए इस्लामाबाद आएंगे या हम दिल्ली आएं।
भारत ने कहा हर चीज में इतना जल्दबाजी ठीक नहीं।
पहले हमे बातचीत से बातचीत का माहौल बनाना चाहिए। फिर बातचीत से तय कर लेंगे की बातचीत के लिए कौनसी जगह सही रहेगी।
इतनी बातचीत के बाद भारत ने बातचीत की। बातचीत के लिए पहले आप दिल्ली आ जाओ फिर हम इस्लामाबाद आके बातचीत करेंगे या फिर इसका उल्टा कर लेते हैं।
जगह बदलने से कौनसी बातचीत बदल जाएगी। बातचीत से दोनों देशों में इस तरह की बातचीत का वातावरण बन चुका था कि दोनों ने परस्पर बातचीत की।
बातचीत सचिव स्तर की, मंत्री स्तर की और प्रधानमंत्री स्तर की हुई। दुर्भाग्य कहें या सोभाग्य सचिव, मंत्री और प्रधानमंत्री स्तर की बातचीत में सचिवों, मंत्रियों और प्रधानमंत्रियों ने तो बातचीत की।
किंतु स्तर सुधरा उस पर कोई बातचीत नहीं हुआ। बातचीत टूट नहीं जाए अत: अमेरिका लगातार दोनों देशों से बातचीत करिए कहता रहा कि ये आप दोनों का आपसी मसला है तो आप दोनों आपस में ही बातचीत करो।
प्रत्येक बातचीत में सारा जोर बातचीत पर रहा। पाकिस्तान ने बातचीत में कहा हम कश्मीर लेकर रहेंगे। भारत ने बातचीत में कहा हम कश्मीर सुंई की नोक की बराबर भी नहीं देंगे। चाहो तो दोबारा बातचीत कर लो।

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