6 हजार किमी दूर से उड़कर आए मेहमान परिंदे छोटे से गड्ढे में रहकर लड़ रहे जिंदगी की जंग

2 वर्ष पहले
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अधमरे कॉमन कूट और नॉर्दर्न शॉवलर को झील से गड्‌ढे में लाए। - Dainik Bhaskar
अधमरे कॉमन कूट और नॉर्दर्न शॉवलर को झील से गड्‌ढे में लाए।
  • झील में इस बार 10 दिन से मौत के तांडव के बीच 32 प्रजातियों के परिंदे अकाल मौत मारे गए
  • परिंदों की मौत की त्रासदी के बीच सरकारी सिस्टम एक 10प्रतिशत पक्षियों को भी बचाने में कामयाब नहीं

जयपुर. सांभर झील में आई पक्षियों की 85 प्रजातियां पिछले साल रिपोर्ट की गई थीं। अबकी बार 10 दिन से मौत के तांडव के बीच 32 प्रजातियों के परिंदे अकाल मौत मारे गए। भास्कर ने पहली बार सोमवार को कुछ बर्ड एक्सपर्ट से डेड-बॉडीज की पहचान कराई। अभी तक सिस्टम के आंकड़ों में यह बात शामिल नहीं हो पाई है। परिंदों की मौत गिनने के बजाए अनदेखी से मिट्टी हुई लाशों पर अफसरों की कामयाबी के सबूत दूसरे ही दिन नजर आ गए। रविवार को नागौर एरिया में जहां 5 हजार 200 से ज्यादा मृत परिंदे बताए गए थे, सोमवार को 877 डेडबॉडी निकाली गई। भास्कर ने रविवार को ही परिंदों की मौत पर पत्थर बने अफसरों की हकीकत उजागर की थी कि पहले तो उन्होंने रेस्क्यू ऑपरेशन समय पर शुरू नहीं किए। इसके चलते परिंदों की लाशें कीड़ों के हवाले हो गई और तटों पर केवल उनके पंख ही बचे। 
 

अब तक 32 प्रजातियों के पक्षी मृत मिले
नॉर्दन शावलर, कॉमन टील, नार्दन पिंटेल, मलार्ड, ब्लेक ब्राउन हैडेड गल, पलास गल, रफ, कॉमन रेड स्नैक, पायड एवोसेड, मार्स सैंड पाइपर, बुड सैंड पाइपर, लेसर सैंड प्लूवर, लिटिल रिंग फ्लूवर, केंटीस फ्लूवर, कॉमन कुट, रूडी सेलडक, लेसर विसलिंग डक, टमनिक स्टीट, गोडविल, नोबिल डक, ब्लेक विंग स्टील्ट, रेड बेटेल्ड लेपविंग, गल बिल टर्न, रेड सैक, ग्रे फ्लूवर, क्रीस्टेड लार्क, डेमोसियन क्रेन, इंडियन ईगल आउल और फ्लेमिंगो भी।
 

रेस्क्यू किए परिंदों में से 50% मर रहे
सांभर झील में परिंदों की मौत की त्रासदी के बीच सरकारी सिस्टम एक 10प्रतिशत पक्षियों को भी बचाने में कामयाब नहीं हो पाया। सड़ी-गली लाशों के बीच दम तोड़ रहे परिंदों की जान बचाने के लिए अफसर एकजुट ही नहीं हो पाए। और तो और मुख्यमंत्री के आदेश के बावजूद झील पर परिंदों को बचाने के लिए रेस्क्यू सेंटर नहीं खुल पाया। जयपुर डिविजन में अब तक भी झील से 12-15 किमी दूर नर्सरी में घायल पक्षियों को लाया जा रहा है। अंतिम सांसें गिन रहे पक्षियों को यहां तक लाने के लिए पर्याप्त टीमें भी नहीं है। नागौर में तो इस दिशा में हालात और भी बदतर हैं। अभी तक दोनों जगह वन विभाग, पशुपालन और वालियंटर्स ने 330 घायल पक्षियों को रखा हुआ है। इसके अलावा यहां लाने के बाद 50 प्रतिशत के आसपास परिंदे दम तोड़ चुके हैं। जो बचे हुए हैं, उनको वापस रिलीज करने का निर्णय भी नहीं लिया जा रहा, जबकि उनको रखने के लिए सुविधासंपन्न सेंटर भी नहीं है। 
 

ठीक हो रहे पक्षियों को कहां और कैसे छोड़ा जाए, यह तय नहीं
मौके के हालात जानने पर सामने आया कि झील से परिंदों को लाने के बाद उनको एंटीबायोटिक के साथ जो इलाज संभव था वह हो चुका। अब उनको केवल आर्टिफिशियल फूड पर रखा जा रहा है। जानकारों के मुताबिक अव्वल तो झील किनारे ही सेंटर खुलकर पक्षियों को बेसिक इलाज के बाद सॉफ्ट रिलीज की जानी चाहिए थी। वहीं अब दूर सेंटर में ठीक हो रहे पक्षियों को कहां और कैसे छोड़ा जाए, यह तय नहीं किया जा रहा। 
 

नागौर में सिर्फ डेडबॉडीज, रेस्क्यू के इंतजाम ही नहीं
जयपुर डिविजन में डॉ. अरविंद माथुर की देखरेख में रक्षा एनजीओ के साथ लोकल वोलिएंटर दीनेश, ओमप्रकाश आदि की टीम बेहतरीन काम कर रही है। उधर नागौर डिविजन में रेस्क्यू इंतजाम अभी तक कमजोर हैं। जहां पक्षियों के दम तोड़ने तक इलाज नहीं मिल रहा। अभी तक 100 पक्षी भी नहीं बचाए जा सके हैं।

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