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जयपुर / 8 साल पहले प्रोजेक्ट बना, 2 साल पहले पैसा आया, फिर भी जान बचाने को फाइलों में छटपटा रहा गोडावण

Dainik Bhaskar

Jan 13, 2019, 01:55 AM IST


गोडावण को द ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के नाम से भी जाना जाता है। गोडावण को द ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के नाम से भी जाना जाता है।
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गोडावण को द ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के नाम से भी जाना जाता है।गोडावण को द ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के नाम से भी जाना जाता है।

  • पूरी दुनिया से लगभग लुप्त, महज राजस्थान के जैसलमेर में ही बचे हैं 60-70 राज्य पक्षी
  • कैप्टिव ब्रिडिंग शुरू नहीं होने पाने से इसकी संख्या 250 से घटकर 60-70 के आसपास रह गई

जयपुर (महेश शर्मा). दुनिया में लगभग लुप्त होने के बाद सिर्फ राजस्थान में ही बचा गोडावण पक्षी अपना जीवन बचाने के लिए 8 साल से वन विभाग की फाइलों में छटपटा रहा है। कैप्टिव ब्रिडिंग शुरू नहीं होने पाने के कारण इसकी संख्या पिछले कुछ सालों में 250 से घटकर 60-70 के आसपास रह गई है।

 

यह हालात तो तब है, जबकि इस परीक्षा को राज्य पक्षी का दर्जा प्राप्त है। इसको बचाने के लिए आठ साल पहले प्रोजेक्ट तैयार हुआ और  दो साल पहले 22 करोड़ का बजट भी जारी हो चुका है। लेकिन जमीनी स्तर पर कार्रवाई कुछ नहीं हो रही। विशेषज्ञों ने कहा कि अब अगर कुछ महीनों में कैप्टिव ब्रिडिंग की शुरुआत नहीं की गई तो अंगुलियों पर गिनने लायक बचे  ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’  का भी ‘सरिस्काइजेशन’ (सरिस्का में बाघों के खात्मे के बाद प्रचलित शब्द) तय है।

 

बजट आने के बावजूद वन विभाग और वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) इसकी कैप्टिव ब्रिडिंग शुरू नहीं कर पा रहे। हकीकत यह है कि वन विभाग रणथंभौर के बाघों में उलझा हुआ है, जहां की व्यावसायिक गतिविधियां ज्यादा लाभकारी दिखती हैं। पांच राज्यों में पाया जाने वाला यह पक्षी पिछले 20 वर्ष के दौरान गुजरात, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश तो प्रति राज्य 4 से 5 के बीच रह गया है। केवल राजस्थान के जैसलमेर में है। जो घटकर कुछ सालों में 250 से केवल 60-70 के आसपास आ गया है। विभाग यह आंकड़ा 100 के आसपास बताता है।

 

 

जो काम तत्काल करना है, उस पर 8 साल में 3 पैरामीटर पर केवल प्लानिंग
 

  • कैप्टिव ब्रिडिंग के लिए कोटा में सेंटर बनना है
  • विवाद: विभाग वहां नमी को कारण बताता है, जबकि वहां पर अनुकूल वातावरण होता तो गोडावण ही बचा रहता।

 

  • रेडियो कॉलर से ‘फ्लाइट पाथ’ का पता करना
  • विवाद : इसमें समय लगेगा, पता भी कर लेंगे तो गोडावण कैसे बचेगा?

 

  • ब्रिडिंग के बाद अनुकूल वातावरण
  • विवाद : स्थानीय लोग और विधायकों से इस बारे में कभी कोई बड़ी बैठक नहीं हुई।

 

गोडावण लुप्त हुए तो देश की बदनामी

गोडावण लुप्त हुआ तो पक्षी प्रेमियों को धक्का लगेगा। देश की बदनामी होगी। तत्काल प्रभाव से जैसलमेर में उपयुक्त जलवायु के स्थान पर इसके प्रजनन केंद्र की स्थापना होना ही एकमात्र विकल्प है।

-आरएन मेहरोत्रा पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक (सरिस्का में खत्म हुए बाघों के बाद पुन: जीवनदान देने वाले)


गोडावण मामले में स्थिति तो गंभीर है... सच ये भी है कि काम नहीं हुआ
मानता हूं कि इस पक्षी की स्थिति गंभीर है। सच यह भी है कि काम आगे नहीं बढ़ पाया। हम डब्ल्यूआईआई से संपर्क में हैं। प्रोजेक्ट का पैसा उन्हें मिला है। काम उनको आगे बढ़ाना है। अंता, कोटा के पास 700 हैक्टेयर में एनक्लोजर बनाना है। पोकरण के पास भी 5 हैक्टेयर जमीन देनी है। (संबंधित डीएफओ से फोन पर जमीन की स्थिति पूछी तो जवाब मिला फाइल कलेक्टर के पास है।

(चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन जीवी रेड्डी)

 

प्रोजेक्ट के लिए कोई मना नहीं कर रहा, पर काम भी नहीं हो रहा

पैसा तो हमारे पास काफी टाइम से है। हम लोग जमीन के इंतजार में हैं। ये मसला कागजों में ही चल रहा है। चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन से भी बातचीत हुई है, लेकिन बात वही है कि कोई मना नहीं कर रहा, लेकिन सच यह है कि काम भी नहीं हो रहा। अब इंतजार करने का टाइम नहीं है।

(वाई के झाला, वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में प्रोजेक्ट देख रहे वरिष्ठ साइंटिस्ट)

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