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मप्र के 81 कांग्रेस विधायकाें की जयपुर में बाड़ाबंदी, खुद रिसीव करने पहुंचे गहलाेत; राजस्थान तक बढ़ीं सियासी सरगर्मियां

एक वर्ष पहले
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अशोक गहलाेत मध्य प्रदेश के विधायकों को रिसीव करने एयरपाेर्ट पहुंचे। - Dainik Bhaskar
अशोक गहलाेत मध्य प्रदेश के विधायकों को रिसीव करने एयरपाेर्ट पहुंचे।

जयपुर. मध्यप्रदेश में पिछले 9 दिन से चल रही सियासी उठापटक के बीच बुधवार को ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्‌डा की मौजूदगी में भाजपा की सदस्यता ले ली है। जिसके बाद कमलनाथ सरकार ऊपर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। मध्य प्रदेश में उथल-पुथल के बाद इधर राजस्थान तक बढ़ीं सियासी सरगर्मियां बढ़ गई हैं। अब सवाल उठता है क्या राजस्थान में भी मध्यप्रदेश जैसे हालात बन सकते हैं? 4 सवालों से समझिए प्रदेश की सियासत की सेहत।

1.  क्या राजस्थान में भी मध्यप्रदेश जैसे हालात बन सकते हैं?
नहीं। राजस्थान के अशोक गहलोत तीसरी बार सीएम हैं। कांग्रेस के सबसे अनुभवी अाैर जनप्रिय चेहरा हैं। गहलोत की पिछली सरकार के समय उनके पास 96 कांग्रेस विधायक ही थे। उस समय बसपा के छह विधायकों काे पार्टी में मिलाकर सरकार के विधायकाें की संख्या 102 कर दी थी। यह बहुमत की बार्डर लाइन थी, तब भी पांच साल सरकार चलाई थी।  इस बार तो पूर्ण बहुमत है। मैजोरिटी अंक व सरकार के सहयोगी कुल विधायकाें में गेप बहुत ज्यादा है। कांग्रेस के 101 सहित एक आरएलडी व 6 बसपा विधायकों काे पार्टी में शामिल कराकर कुल 107 एमएलए हैं। 13 निर्दलीय भी समर्थन कर रहे हैं। ऐसे में 120 विधायक सरकार के साथ हैं, जो बहुमत से 19 ज्यादा हैं।

2.  क्या निकट भविष्य में सरकार पर कोई खतरा हो सकता है?
वैसे तो राजनीति में कुछ भी संभव है। लेकिन अंकगणित इस संभावना काे नकार रहा है। बीजेपी के अभी आरएलपी गठबंधन के साथ 75 विधायक हैं। 13 निर्दलीय हैं। इन 13 में से 12 तो गहलोत के करीबी अाैर कांग्रेस पृष्ठभूमि से जुड़े हैं।  कांग्रेस सरकार को अस्थिर करने के लिए 13 निर्दलीय विधायकाें की अाेर से भाजपा काे समर्थन देने के अलावा कांग्रेस के कम से कम 26 विधायकों से इस्तीफा दिलवाना पड़ेगा। यह लगभग नामुमकिन है, क्योंकि निर्दलीय 13 और बीटीपी के दो भी कांग्रेस के समर्थन में हैं। ये निर्दलीय विधायक भाजपा काे कभी अपना समर्थन नहीं देंगे। अगर और आसान शब्दों में कहें तो भाजपा को सरकार बनाने के लिए कम से कम 35 से 40 कांग्रेस समर्थित विधायकों का इस्तीफा आवश्यक है, जो असंभव है।

3. सीएम गहलोत और प्रदेशाध्यक्ष सचिन के बीच विवाद कहां तक पहुंच सकता है? 
मप्र की तरह सीएम की कुर्सी की खींचतान राजस्थान में भी है, लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा कदम पायलट नहीं उठाएंगे। क्योंकि पायलट के पास दो पद पहले से हैं। डिप्टी सीएम और छह साल से पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष का पद उनके पास है। सिंधिया के पास कोई ताकतवर पद नहीं था। अाराेप है कि उनकी उपेक्षा की जा रही थी। समानता यह है कि सिंधिया की तरह सचिन पायलट भी राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं। 

4. राजस्थान में सियासत कोई नया मोड़ लेगी?
आने वाले दिनों में सबसे बड़ा बदलाव मंत्रिमंडल में देखने को मिलेगा। मंत्रिमंडल का विस्तार जल्द होगा। ताकि जाे असंतुष्ट है, उन्हें शांत किया जा सके। निगम, बोर्ड, अथाॅरिटी व आयोगों में राजनीतिक नियुक्तियां होंगी। आलाकमान गहलोत और पायलट के बीच संतुलन बनाकर चलने की काेशिश करेगा, जिससे राजस्थान की सरकार पर काेई संकट खड़ा न हाेने पाए। 

ऐसे अवसरवादी पहले ही चले जाते ताे ठीक रहता, जनता माफ नहीं करेगी : गहलोत
सीएम अशोक गहलोत ने ट्वीट किया कि भाजपा जब देश की अर्थव्यवस्था, लोकतांत्रिक संस्थाओं व सामाजिक ताने बाने के साथ ही न्यायपालिका को बर्बाद कर रही है। ऐसे में राष्ट्रीय संकट के समय कुछ नेता खुद की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए भाजपा से हाथ मिला रहे हैं। सिंधिया ने लोगों के साथ ही विचारधारा के साथ विश्वासघात किया है। ऐसे लोग बिना पावर कामयाब नहीं हो सकते हैं। अवसरवादी लोग पहले ही चले जाते तो ठीक रहता। कांग्रेस ने बहुत कुछ दिया, पदों पर रखा और एमपी व केंद्रीय मंत्री बनाया। मौका आने पर मौकापरस्ती दिखाई। जनता माफ नहीं करेगी।

राजमाता हमारे बीच हाेतीं ताे इस निर्णय पर गर्व करतीं : वसुंधरा
राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कहा कि आज राजमाता हमारे बीच होतीं तो जरूर गर्व करतीं। ज्योतिरादित्य ने राजमाता जी द्वारा विरासत में मिले उच्च आदर्शों का अनुसरण करते हुए देशहित में फैसला लिया है, जिसका मैं व्यक्तिगत व राजनीतिक दोनों ही तौर पर स्वागत करती हूं।

पार्टी के भीतर ही मामला सुलझ जाता तो ठीक रहता : पायलट
डिप्टी सीएम सचिन पायलट ने ट्वीट कर कहा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया का बीजेपी में इस तरह शामिल हो जाना दुखद व दुर्भाग्यपूर्ण है। मेरा मानना है कि उनके बीजेपी में जाने की बजाए यदि मामला कांग्रेस के भीतर ही सुलझ जाता तो बेहतर होता।

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