राजस्थान / मां के आंसुओं से उठते सवाल- शहीद बेटा सपने में आता है, पुण्यतिथि से पहले स्मारक तो बनवा दो

पत्नी सरोज देवी, बेटी पलक और पिता की वर्दी में बेटा हर्षित। पत्नी सरोज देवी, बेटी पलक और पिता की वर्दी में बेटा हर्षित।
शहीद की माता - गणपति देवी। शहीद की माता - गणपति देवी।
शहीद के पिता - गोधाराम। शहीद के पिता - गोधाराम।
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पत्नी सरोज देवी, बेटी पलक और पिता की वर्दी में बेटा हर्षित।पत्नी सरोज देवी, बेटी पलक और पिता की वर्दी में बेटा हर्षित।
शहीद की माता - गणपति देवी।शहीद की माता - गणपति देवी।
शहीद के पिता - गोधाराम।शहीद के पिता - गोधाराम।

  • कश्मीर मुठभेड़ में शहीद महेश के पिता बोले- एक दिन सम्मान हुआ, अब बार-बार हो रहा है बेटे का अपमान
  • 2 बार कलेक्टर, 7 बार एसडीएम, 8 बार तहसीलदार से मिल चुका, 7 माह हो गए न पैकेज मिला न स्मारक बना

दैनिक भास्कर

Aug 03, 2019, 05:12 PM IST

जयपुर. (बाबूलाल शर्मा). सीमा पर युद्ध हों या सीमा के अंदर आतंकी हमले, सैनिक हमारे देश के लिए  सर्वोच्च बलिदान देने से पीछे नहीं हटते। देश के लिए जान देने वाले वीर शहीदों को सेना व सरकार भी सिर-माथे रखती है। उन्हें सम्मान और सहारा मिलता तो है लेकिन कई बार सरकारी जटिलताएं पूरी करते-करते शहीदों के परिजन हिम्मत हार जाते हैं। सबसे बड़ा बलिदान देने वाले शहीदों को उनका हक मिलने में क्यों लगता है इतना वक्त? यही सवाल पूछती हमारी विशेष सीरिज की दूसरी कड़ी में कश्मीर में शहीद हुए महेश कुमार के परिजनों के संघर्ष की कहानी... 

 

मदद के नाम पर सिर्फ एक लाख

जम्मू-कश्मीर के त्राल क्षेत्र के अरिपाल गांव में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान 5 जनवरी को तीन गोली लगने के बाद नौ दिन तक जिंदगी-मौत के बीच जूझकर 14 जनवरी को दिल्ली के एम्स में उपचार के दौरान शहीद हुए महेश कुमार के परिजन सरकारी अफसरों की ढिलाई के आगे हताश हो गए हैं।...शहीद होने के सात माह बाद भी महेश के परिजनों को न तो सरकार से घोषित राहत पैकेज मिला और न ही गांव में शहीद का स्मारक बना। परिजनों को सिर्फ एक लाख रुपए ही मिले हैं।

 

अब अफसर कटवा रहे चक्कर

रिटायर्ड प्रिंसिपल 65 वर्षीय पिता गोधाराम सरकारी तंत्र से बहुत खफा हैं। बुझे मन से कहते हैं- मेरा बेटा 38 साल की उम्र में अपने दो बच्चों और हम सबको छोड़कर देश के लिए शहीद हो गया। महेश की जब डैड बॉडी घर आई तो रींगस से लांपुआ तक लोगों का खूब मेला लगा था। वसुंधरा जी, सुमेधानंद जी से लेकर गोविंद सिंह डोटासरा, महादेव सिंह खंडेला, कलेक्टर, एसपी सहित भाजपा-कांग्रेस के कई नेता घर आए थे। उस समय शहीद का खूब सम्मान हुआ था। अब सरकारी तंत्र की लापरवाही से उसका अपमान हो रहा है।... राज्य सरकार से न तो राहत पैकेज मिला है और न ही शहीद का स्मारक बना। अफसर हमें इधर से उधर चक्कर कटवा रहे हैं।

 

कई बार अधिकारियों से मिल चुका हूं

गोधाराम के मुताबिक राहत पैकेज और स्मारक के लिए अब तक दो बार सीकर कलेक्टर से, 7-8 बार तहसीलदार से, इतनी ही बार एसडीएम से और तीन-चार बार सैनिक कल्याण बोर्ड के नीमकाथाना अधिकारियों से मिल चुका हूं। हालत देखिए सरकारी राहत की कागजी कार्रवाई में हमने सैनिक कल्याण बोर्ड के दफ्तर जाकर फार्म कम्पलीट करके भेजा था, अब 19 जुलाई को सचिवालय से फार्म रिटर्न होने के बारे में लेटर आया है। उसमें लिखा है कि प्रपत्र-क अनकम्पलीट है। उधर, नीमकाथाना दफ्तर वाले कह रहे हैं कि फार्म पूरा करके भिजवाया था।

 

फाइल होती रही इधर से उधर
महेश के पिता कहते हैं- स्मारक के लिए जमीन आवंटन के बारे में 3 मार्च को श्रीमाधोपुर तहसीलदार के पास एप्लीकेशन लगाई थी। 7 मार्च को तहसीलदार ने इसे एसडीएम के पास भेज दिया था। एक माह तक फाइल एसडीएम कार्यालय में पड़ी रही, फिर कवरिंग लेटर नहीं लगाने की बात कह कर वापस तहसीलदार के पास भेज दी। फिर एक माह तक तहसील में फाइल पड़ी रही। परेशान होकर मैं सीकर कलेक्टर से मिला। उन्होंने पूछताछ की तो मुझे सब पता चला। यह हाल है सरकारी दफ्तरों के। जब शहीदों के मामले में ऐसा कर रहे हैं तो आम आदमी के साथ तो क्या करते होंगे? 


मां बोलीं- मैंने सपने में बुरा देखा था

मां गणपति देवी शहीद बेटे को याद कर कहती हैं- वह एक माह की छुट्टी काटकर 24 दिसंबर को ही यहां से गया था। मुझे तो गोली लगने के अगले दिन छह तारीख को पता चला कि महेश के गोली लग गई है। तीन जनवरी को बहुत खराब सपना आया था, जैसे महेश नहीं रहा। सपने में महेश ने मां-मां की आवाज लगाई और फिर लगा जैसे वो इस दुनिया से चल बसा।... जिस रात सपना आया उसकी सुबह चार जनवरी को मैंने उसको फोन किया था।

 

वापस आने को कहा था, नहीं माना

मैंने कहा-तू वापस आ जा। उसने कहा-अभी तो गया हूं, अब छुट्‌टी नहीं मिल सकती। जब वो खत्म हुआ, उसकी पहली रात भी मुझे सपना आया। सपने में बोला-मां मैं आ गया हूं। 10 दिन पहले भी वो सपने में आया। बोला-मां मैं एक महीने की छुट्‌टी पर आ गया हूं। उठकर देखा। कोई नहीं था। मैं किससे क्या कहूं, वो तो चला गया, वापस तो आएगा नहीं।

 

पत्नी को फोन नहीं उठाने की टीस

पत्नी सरोज देवी कहती हैं- वे किसी ऑपरेशन पर जाने से पहले मुझसे फोन पर बात करते थे। उस दिन उन्होंने फोन किया, मैं उठा नहीं पाई। बाद में मैंने किया लेकिन उन्होंने नहीं उठाया। ऐसा पहली बार हुआ था। उसके बाद कभी बात नहीं हो पाई। आज तक मन में टीस है कि मैंने उस दिन फोन क्यों नहीं उठाया।

 

शहीद महेश कुमार, 32 वर्ष 
गांव लांपुआ, सीकर : जम्मू-कश्मीर में आतंकी मुठभेड़ में 5 जनवरी 2019 को तीन गोलियां लगीं, 9 दिन बाद 14 जनवरी को दिल्ली एम्स में निधन

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