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1947 से 1970 तक के शहीदों के आश्रितों को अब मिलेगी नौकरी

एक वर्ष पहले
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भारत-पाक के बीच 1965 की लड़ाई में शहीद हुए छंगाराम यादव की मूर्ति को सैल्यूट करती 83 वर्षीय वीरांगना अमृतकला देवी।
  • वसुंधरा सरकार ने अक्टूबर 2018 में जारी किया था नोटिफिकेशन
  • कांग्रेस ने इसे छह माह के फैसलों की समीक्षा में ले लिया था, अब कमेटी ने इसे समीक्षा से हटाया

जयपुर. प्रदेश में 1970 से पहले के शहीदों के आश्रितों को सरकारी नौकरी का रास्ता साफ हो गया है। पिछली वसुंधरा सरकार ने अक्टूबर 2018 में नोटिफिकेशन जारी किया था कि 1947 से 31 दिसंबर 1970 तक शहीद हुए सैनिकों के एक-एक आश्रित को नौकरी दी जाएगी। इस नोटिफिकेशन के बाद दायरे में आने वाले शहीद परिवारों के पोते-पोतियों व रक्त संबंध में आने वाले आश्रितों ने जिला सैनिक कल्याण कार्यालयों में नौकरी के आवेदन किए। लेकिन इससे बाद सत्ता में आई अशोक गहलोत सरकार ने छह माह की समीक्षा में इस फैसले को शामिल कर लटका दिया था।
 
शहीद परिवारों की परेशानियों को देखते हुए सरकार ने अब इसे समीक्षा से बाहर कर दिया है। प्रदेश में 1947 से 1970 तक लगभग एक हजार सैनिक शहीद हुए हैं। इनके सहित अब तक प्रदेश के करीब 2 हजार सैनिक शहीद हो चुके हैं। इसमें से लगभग 400 से ज्यादा सैनिक कारगिल के दौरान शहीद हुए थे। 1971 के बाद तथा 1999 में शहीद सैनिकों के आश्रितों को ही राज्य सरकार के करगिल पैकेज के तहत सरकारी नौकरी देने का प्रावधान पहले से था। 
 

53 साल तक इंतजार किया अब होगा सरकारी नौकरी का सपना पूरा
1965 के भारत-पाक युद्ध में राजौरी सेक्टर की संजोई-मीरपुर चौकी पर देश रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने वाले नायब सुबेदार छंगाराम यादव के परिवार को 53 साल बाद सरकारी नौकरी की आस बंधी थी। छंगाराम के बेटे धनसिंह कहते हैं पिता की शहादत के समय में मात्र दो साल का था। अब 55 साल का हो गया हूं। पिछली सरकार के फैसले के बाद बेटे इंदरसिंह के लिए सैनिक कल्याण अधिकारी के दफ्तर में नौकरी का आवेदन किया था।1965 के युद्ध में ही शहीद हुए छंगाराम की वीरांगना 83 वर्षीय अमृतकला वसुंधरा सरकार के फैसले के बाद अपने पौते इंदर सिंह को सरकारी नौकरी दिलवाने के लिए सरकारी दफ्तरों में कई दिनों तक भटकीं। अब उनके लिए यह फैसला राहत देने वाला होगा।
 

53 साल तक इंतजार किया अब होगा सरकारी नौकरी का सपना पूरा 
1965 के भारत-पाक युद्ध में राजौरी सेक्टर की संजोई-मीरपुर चौकी पर देश रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने वाले नायब सुबेदार छंगाराम यादव के परिवार को 53 साल बाद सरकारी नौकरी की आस बंधी थी। छंगाराम के बेटे धनसिंह कहते हैं पिता की शहादत के समय में मात्र दो साल का था। अब 55 साल का हो गया हूं। पिछली सरकार के फैसले के बाद बेटे इंदरसिंह के लिए सैनिक कल्याण अधिकारी के दफ्तर में नौकरी का आवेदन किया था।1965 के युद्ध में ही शहीद हुए छंगाराम की वीरांगना 83 वर्षीय अमृतकला वसुंधरा सरकार के फैसले के बाद अपने पौते इंदर सिंह को सरकारी नौकरी दिलवाने के लिए सरकारी दफ्तरों में कई दिनों तक भटकीं। अब उनके लिए यह फैसला राहत देने वाला होगा।

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