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सत्ता की ‘शक्ति’ / पिछले 4 चुनावों में से 3 बार पुुरुषों के मुकाबले महिला प्रत्याशियों की जीत का प्रतिशत ज्यादा



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  • साल 2013 में महिला प्रत्याशियों की जीत का प्रतिशत 17 था, जबकि पुरुषों का सिर्फ 9%
  • सियासी दंगल में हिट, फिर भी पुरुषों के मुकाबले 10% सीटों पर भी मौका नहीं मिलता

Dainik Bhaskar

Oct 13, 2018, 03:30 AM IST

यास्मीन सिद्दीकी, जयपुर. राजस्थान के विधानसभा चुनावों की बात करें तो जीत दर्ज करने के मामले में महिलाओं का रिकॉर्ड पुरुषों के मुकाबले कहीं बेहतर है। 1998 से 2013 तक के चार चुनावों पर नजर डालें तो तीन बार महिला प्रत्याशियों की जीत का प्रतिशत पुरुषों की तुलना में ज्यादा रहा है। सिर्फ 2003 में पुरुष प्रत्याशियों की जीत का प्रतिशत ज्यादा रहा।

 

बावजूद इसके अगर चुनावी मैदान में प्रत्याशियों को उतारने की बात की जाए तो महिलाएं पुरुषों के मुकाबले बहुत पीछे हैं। पिछले 4 चुनावों में पुरुष प्रत्याशियों के मुकाबले 10% महिला प्रत्याशी भी मैदान में नहीं उतारी गईं।

 

2013 : सबसे ज्यादा अंतर रहा था जीत के प्रतिशत में

 

प्रत्याशी विजयी जीत का%
पुरुष 1930 172  9%
महिला 166 28 17%
कुल 2096  200  9.5%

 

2003 : 15 सालों में सिर्फ इसी साल पुरुषों से पीछे

 

प्रत्याशी   विजयी जीत का%
पुरुष    1423 188 13.2%
महिला    118 12  10%
कुल    1541  200 13%

 

 

2008 : सर्वाधिक महिला प्रत्याशी विधानसभा पहुंचीं

 

प्रत्याशी विजयी  जीत का%
पुरुष    2040 172  8.4%
महिला 154  28  18%
कुल    2194 200   9.1%

 

 

1998 : पुरुषों की तुलना में जीत का प्रतिशत सर्वाधिक    

 

प्रत्याशी विजयी जीत का%
पुरुष  2349 190 13.6%
महिला 190 9 21%
कुल    2445  199  9.5%


 

एक ऐसा भी दौर गुजरा है... जब सीएम, राज्यपाल और विधानसभा स्पीकर, तीनों बड़ी कुर्सियों पर महिलाएं बैठीं : राज्य की सियासत में साल 2003 महिलाओं के लिए बड़ा यादगार रहा। राज्य ने राजनीति में एक नई मिसाल कायम की। उस वक्त सीएम के तौर पर वसुंधरा राजे थीं। राज्यपाल के तौर पर प्रतिभा पाटिल थीं तो विधानसभा की स्पीकर सुमित्रा सिंह रहीं। यानी सत्ता की तीनों बड़ी कुर्सियों पर महिलाएं ही विराजमान थीं।

 

गोलमा देवी बनीं मिसाल... पढ़ी-लिखी न होने के बाद भी मंत्री बन गईं, अपनी वेशभूषा और बोली से चर्चित रहीं : राजस्थान की राजनीति में गोलमा देवी एक मिसाल हैं। वे पढ़ी-लिखी न होने के बावजूद कैबिनेट तक पहुंचने में सफल रहीं। जब वे मंत्री थीं, तो अपनी वेशभूषा और बोली की वजह से चर्चा में रहीं। वे खादी और ग्रामोद्योग मंत्री थीं। उनकी छवि एक तेज-तर्रार नेता के रूप में थी।

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