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देश ही नहीं विदेशों में भी पहचान रखती है राधाकुण्ड की ये हस्त निर्मित तुलसी चंदन मालायें

एक वर्ष पहले
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  • गुरू पूर्णिमा पर गुरू व शिष्य परंपरा को जोडती है यही मालाएं
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मनीष शर्मा/भरतपुर. भारतीय संस्कृति में तुलसी व चंदन को भगवान का सबसे प्रिय माना जाता है। तुलसी चंदन माला को गुरू शिष्य परंपरा का प्रतीक भी माना गया है। जिले के समीपवर्ती में मथुरा के राधाकुण्ड में हस्त निर्मित तुलसी व चंदन की माला का बड़ा ही महत्व है। यहां के बंगाली कारीगर ग्राहक की संतुष्टि के लिये उनके सामने ही माला व कंठी तैयार करके भी दे देते है। देशी विदेशी कृष्ण भक्तों में यहां की कंठी मालाओं का खासा क्रेज भी है।

 

राधाकुण्ड मे ऐतिहासिक राधाकुण्ड व कृष्ण कुण्ड के ऊपर सड़क किनारे फुटपाथ पर लगी इन कारीगरो की कंठी मालाओं की दूकानों से खरीददार भी गिरिराज परिक्रमा करते हुये कंठी मालायें खरीद लेते है। यहां बनाई गई तुलसी, कमल गट्टी, लाल चंन्दन, पथरी माला, आदि लकड़ी की मालाऐं विदेशों तक सप्लाई होती है।  

 

देशी-विदेशी भक्त मुड़िया मेला सहित कार्तिक मास मे एक माह यहां रह कर नियम सेवा करते है तथा गिर्राज परिक्रमा लगाते हैं। यही राधाकुण्ड से मालाऐं खरीद कर ले जाते हैं। वहीं माला विक्रेता के अनुसार श्रद्धालुओं की मांग पर हिन्दू धर्म के हर देवी-देवता की अलग-अलग मालाऐं होती है। 

 

राधाकुण्ड में 25 साल से माला कारीगरी कर रहे निताईदास ने बताया कि राधाकुण्ड की मालाऐं देश ही नही विदेशों में भी जाती हैं। देशी-विदेशी भक्त कंठ और जपमाला अधिक करीदते हैं। राधाकुण्ड मे ही दो सैकड़ा से अधिक बंगाली माला कारीगर और 40 से 50 दुकानें हैं

 

एक माला को बनाने में लगभग 3 घण्टें से अधिक समय लगता है। कड़ी मेहनत के बाद कारीगर मालाओं को पूरी तरह से बनाकर बेचता है। साधारण माला बनाने में करीब 5 से 10 और जप माला 50 से 100 रूपये की लागत मै वनती है। गले में पहने के लिए लक्ष्मी, गणेश, सरस्वती, राम, कृष्ण,विष्णु तथा नवग्रह की साधना में रूद्राक्ष की माला अधिक लाभकारी है।


 

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