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जयपुर (अनुराग बासिडा). नगर निगम जयपुर के अफसर आम नागरिक ही नहीं बल्कि, राज्य सूचना आयोग तक को सूचनाएं उपलब्ध कराने के बजाय टरका दिया। यहां तक कि आयोग के आदेशों तक पर अमल नहीं कर रहे है। एक मामले में तो आयोग ने निगम अफसरों को एक के बाद एक, आठ पत्र लिखे। बावजूद सूचनाएं नहीं दी गई। यह भी उस स्थिति में है जब सरकार ने आरटीआई में सूचना नहीं देने के एक मामले में फार्मेसी काउंसिल ऑफ राजस्थान के रजिस्ट्रार को बर्खास्त तक कर दिया था।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि सूचना का अधिकार का मूल उद्देश्य नागरिकों को सशक्त बनाने, विभागों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने, भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने और लोकतंत्र को लोगों के लिए मजबूत करना है। लेकिन कई अधिकारी इस कानून को लेकर संवेदनशील व गंभीर नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे का कहना है कि ऐसे अधिकारियों के खिलाफ सरकार को कार्रवाई करना चाहिए।
प्रकरण एक : अपीलार्थी गिर्राज शर्मा की ओर से 25 जुलाई, 2015 में नगर निगम के सहायक अभियंता (रिकॉर्ड) से सूचना मांगी गई थी। द्वितीय अपील में सूचना आयोग ने अपीलार्थी को रिकॉर्ड का अवलोकन करवाने के साथ 60 प्रतियां निशुल्क उपलब्ध करवाने का आदेश दिया था। लेकिन, एक साल तक न रिकॉर्ड का अवलोकन करवाया न ही आयोग को सूचना दी गई। इस कड़ी में आयोग ने 8 बार नगर निगम भी लिखे। बावजूद आयोग में निगम से न कोई उपस्थित हुआ न ही पत्र का जबाव दिया।
प्रकरण दो : अम्बाबाड़ी निवासी सीताराम अग्रवाल ने नवंबर 2017 में नगर निगम के उपायुक्त विद्याधर नगर से 2 बिन्दुओं पर सूचना मांगी। सूचना नहीं मिलने पर द्वितीय अपील की। आखिरकार उपायुक्त पर 25 हजार का हर्जाना लगाया।
अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखेंगे
25 हजार रुपए के हर्जाने से अधिकारियों को कोई फर्क नहीं पड़ता। विभागीय सचिव को अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखेंगे। -लक्ष्मण सिंह राठौड़, आयुक्त, राज्य सूचना आयोग।
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