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यहां प्रसूताएं बिलखती रहती हैं, परिजन हाथ जोड़े खड़े रहते हैं..., और सफाईकर्मी 'डॉक्टर' बनकर आ जाते हैं, यहां प्रसूताओं को अपनी ड्रिप की बोतल खुद ही अपने हाथों से संभालनी पड़ती है

2 वर्ष पहले
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जयपुर (Jaipur Rajasthan News). 7 जनवरी को जैसलमेर में डिलीवरी करा रहे कंपाउंडर ने बच्चे को इस बेरहमी से खींचा कि शिशु के दो टुकड़े हो गए। घटना के बाद भास्कर के दो रिपोर्टरों ने महिला सहयोगियों के साथ 28 दिन तक 13 जिलों के 92 अस्पतालों के लेबर रूम्स का सच जाना। भास्कर अब ऐसे ही टैबू यानी जिन मुद्दों पर कभी बात नहीं होती...उनके खिलाफ लगातार खबरों के जरिए हमले करेगा।

13 जिलों में भास्कर टीम ने लेबर रूम की हकीकत जानने के लिए वहां 10-10 घंटे तक बिताए। कई-कई घंटों तक अस्पताल के लेबर रूम और वहां के हालात की रिकॉर्डिंग की। हमारी टीम ने 28 दिन तक 1500 किलोमीटर से ज्यादा सफर तय कर शहरी, ग्रामीण, पहाड़ी और आदिवासी इलाकों के स्वास्थ्य केंद्रों के हालात जाने। इस दौरान महिला सहयोगियों बाल व महिला चेतना समिति (भीलवाड़ा) की अध्यक्ष तारा अहलुवालिया और अनिता कुमावत ने लेबर रूम के भीतर के हालात पर नजर रखी। बाहर की व्यवस्थाओं पर नजर भास्कर रिपोर्टर्स ने रखी। कई जगह भास्कर टीम प्रसूताओं और परिजनों को विश्वास में लेकर उनके परिजन बनकर भी लेबर रूम तक पहुंची।तस्वीर आपको विचलित कर सकती है... ...पर छापना जरूरी ताकि सरकारें जान सकें कि लेबर रूम किस तरह महिलाओं के लिए जानलेवा बनते जा रहे हैं

पढ़िए 13 जिलों से भास्कर की रिपोर्ट

कई जगह दर्द से कराहती प्रसूताएं हमारी सहयोगी तारा अहलुवालिया को ही अस्पताल का स्टाफ समझ बैठी। वे उन्हीं से दर्द से निजात दिलाने की गुहार लगाती रही। प्रसव के पहले और बाद में महिला वार्डों में 24-24 घंटे तक प्रसूताओं की सुध लेने वाला कोई नहीं था। ड्रिप बदलने वाला सफाई कर्मचारी भी उनके लिए भगवान से कम नहीं था।

13 जिलों से रिपोर्ट

24 साल की दीक्षा कंवर 7 जनवरी का वो दिन कभी नहीं भूल सकती। जैसलमेर के रामगढ़ में डिलीवरी के दौरान मेल नर्स ने उसके शिशु को इस तरह खींच लिया कि उसके दो टुकड़े हो गए। नौ महीने जिस जीवन को दीक्षा ने सींचा...उसका ऐसा अंत...किसी की भी रूह कांप जाए। जो दर्द दीक्षा ने झेला कुछ वैसा ही दर्द राजस्थान के हर सरकारी अस्पताल में आने वाली महिलाएं रोज झेल रही हैं। जैसलमेर की घटना के बाद भास्कर ने राज्य के सरकारी लेबर रूम्स का स्टिंग किया।

ये वो तस्वीरें जिनकी वजह से राजस्थान मातृ व शिशु मृत्यु दर में तीसरे स्थान पर

- बांसवाड़ा, सफाई कर्मचारी लेबर रूम से एक महिला का प्रसव कराकर बाहर लाया। उसके कपड़े इतने गंदे थे कि मैल की पपड़ी जमी हुई थी। वार्ड का जिम्मा भी वही संभालता है। मेल नर्स धीरज मल अपने कमरे में बैठा था।

- डूंगरपुर, यहां वार्ड बॉय हरीश व विनोद से मिले, दोनों प्रसूताओं की ड्रिप बदल रहे थे। हरीश बोला-18 साल हो गए...रोज मैं ही ड्रिप चेंज करता हूं। प्रसूता बोली-नर्स और डॉक्टर तो डिलिवरी के बाद से ही नहीं आए।
- उदयपुर, वार्ड बॉय रमेश चंद्र एक महिला का प्रसव करा रहा रहा था। महिला कराह रही थी तो नर्स ने बाहर से डांटा। भास्कर टीम पहुंची तो रमेश एक तरफ खड़ा हाे गया। लेबर रूम के बाहर नर्स मधु व नंद मीणा मोबाइल देख रही थी।


बच्चे ने पेट में दम तोड़ा, 12 घंटों तक गोनी की आंखें यूं ही डॉक्टर को ढूंढती रही...
फोटो सड़ा गांव की गोनी की है। बिस्तर पर लेटी गोनी का बच्चा पेट में मर चुका था। नर्सिंग स्टाफ और डॉक्टर उसे 12 घंटे तक संभालने नहीं आए। भास्कर टीम ने जब गोनी से बात की तो उसने बताया- बच्चे की मौत का पता तो कल ही चल गया था। इसके बावजूद किसी ने हाथ तक नहीं लगाया। आज नर्स दर्द का इंजेक्शन लगाकर गई है।


बांसवाड़ा, यहां शराब के नशे में धुत सफाई कर्मचारी रामा मिला। बोला- हजारों डिलीवरी करा चुका हूं। अंदर जो डिलीवरी करा रहा है वो हीरालाल क्या जानता है...। वो तो पैसों के लालच में डिलीवरी कराता है।
603 सीएचसी में 540 विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी


3 चौंकाने वाले सच

3 साल में 21072 बच्चों की मौत...देश में एक हजार जीवित जन्म पर 34 बच्चों की मौत होती है वहीं राजस्थान में 41 बच्चे मौत के मुंह में समा जाते हैं। प्रदेश में 2014 से 2017 तक जन्म से 4 सप्ताह की अवधि में 21 हजार 72 नवजात बच्चों की मौत हुई थी।

एक लाख में 199 प्रसूताओं की मौत...राजस्थान में प्रति एक लाख में से 199 महिलाओं की प्रसव के दौरान या गर्भावस्था के दौरान मृत्यु हो जाती है। उदयपुर संभाग में हर एक लाख में से 250 महिलाओं की गर्भावस्था

या प्रसव के दौरान मौत हो जाती है।

603 सीएचसी में 540 विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी...हर सीएचसी में सर्जन, स्त्री रोग विशेषज्ञ, शिशु रोग विशेषज्ञ और चिकित्सा अधिकारी होने चाहिए। पीएचसी पर एक डॉक्टर सहित नर्सिंग स्टाफ होना चाहिए लेकिन प्रदेश की 603 सीएचसी में 322 सर्जन, 113 गायनी और 105 एनेस्थिसियन की कमी है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार प्रदेश में 77,122 चिकित्सक होने चाहिए पर 38,142 डॉक्टर ही हैं। प्रदेश में 1000 की जगह 10 हजार की आबादी पर 1 डॉक्टर है।

- यहां सबसे बड़े एमबीएच अस्पताल के लेबर रूम की सबसे हैरान करने वाली तस्वीर। यहां प्रसूताओं को अपनी ड्रिप की बोतल खुद अपने हाथों से संभालनी पड़ती है।

हमारी सरकार प्रसव केन्द्रों और लेबर रूम को लेकर संवेदनशील है। हमने स्वास्थ्य विभाग के आला अफसरों को निजी अस्तपालों के लेबर रूम का अध्ययन करने भेजा है। ताकि उनकी तर्ज पर सरकारी लेबर रूम के हालात सुधारे जा सकें। - रघु शर्मा, स्वास्थ्य मंत्री