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जिस नियम से पहली भर्ती अटकी, दूसरी में भी वही नियम लागू, अब नया विवाद

राज्य में नर्सिंग सैकंड ग्रेड की 4,155 पदों पर होने वाली नई भर्तियां में भी 3 प्रतिशत दिव्यांग कोटे में एक पैर की...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 03:35 AM IST

राज्य में नर्सिंग सैकंड ग्रेड की 4,155 पदों पर होने वाली नई भर्तियां में भी 3 प्रतिशत दिव्यांग कोटे में एक पैर की विकलांगता और दोहरी विकलांगता को लेकर फिर विवाद खड़ा हो गया है। इस भर्ती में दिव्यांगता कोटे में वन लेग डिसेबिलिटी का नियम लागू किया गया है जबकि इस नियम को लेकर ही करीब दो साल से दिव्यांगों और सरकार के बीच खींचतान चल रही है। ये वे विकलांग हैं, जिन्हें पहले तो मैरिट लिस्ट में शामिल कर लिया गया, लेकिन बाद में यह कहकर नियुक्ति रोक दी कि नर्सिंग सैकंड ग्रेड के लिए एक पैर की विकलांगता वाले अभ्यर्थी ही पात्र हैं। हैरानी की बात यह है कि मेडिकल बोर्ड ने दोहरी विकलांगता वालों को भी इस पद के लिए सक्षम माना। फिर नि:शक्तजन आयुक्त ने भी उनके पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद सरकार ने इन्हें फिर नियुक्ति देने का निर्णय तो कर लिया, लेकिन दो साल बाद भी ऐसे दिव्यांग नौकरी के लिए चक्कर ही काट रहे हैं। नई भर्ती निकलने के साथ ही पहले चयनित दिव्यांग अभ्यर्थी अब फिर सरकार के सामने आ खड़े हुए हैं। दिव्यांग अभ्यर्थियों का कहना है कि पहले विभाग उन्हें तो नियुक्ति दे, फिर नई भर्तियां करे।

कंट्रोवर्सी

नर्सिंग सैकंड ग्रेड भर्ती : एक पैर विकलांगता के नियम के कारण ही 2011 की भर्ती में पहली मेरिट लिस्ट में आए 28 अभ्यर्थियों को अब तक नियुक्ति नहीं

जानिए पहली भर्ती में कब क्या हुआ

स्वास्थ्य विभाग ने साल 2013 में नर्स सैकेंड ग्रेड द्वितीय के 11,000 पदों पर सीधी भर्ती शुरू की थी। पहली सूची में 8,000 अभ्यर्थियों की लिस्ट जारी की गई। इस सूची में दोहरी और एक पैर की विकलांगता वाले अभ्यर्थी शामिल थे। इस बीच भर्ती प्रक्रिया पर स्टे आ गया।

2016 में स्टे खारिज हुआ, तो विभाग ने एक नई सूची फिर से जारी कर दी और इसमें पहले जारी सूची के अभ्यर्थियों को यह कहकर बाहर कर दिया कि अब एक पैर की विकलांगता वाले दिव्यांगों को ही सक्षम माना गया है।

दिव्यांग अभ्यर्थियों ने जब इसकी शिकायत की तो एक मेडिकल बोर्ड गठित किया गया और सभी का फिर से मेडिकल कराया। मेडिकल बोर्ड ने इन लोगों को नर्सिंग कार्य के लिए सक्षम माना।

14 अक्टूबर, 2016 को हुई मीटिंग में इन लोगों को नियुक्ति दिए जाने का फैसला हुआ, लेकिन नियुक्ति नहीं मिली तो दिव्यांग निशक्तजन आयुक्त न्यायालय गए। कोर्ट में अफसरों ने माना कि इन्हें जल्द नियुक्ति दे दी जाएगी। नियुक्ति नहीं मिली तो अभ्यर्थी फिर कोर्ट की शरण में पहुंच गए। कोर्ट ने अफसरों को तलब किया। कुल मिलाकर 2 साल बाद भी ये दिव्यांग नियुक्ति के लिए भटक रहे हैं।

पद खाली, पर नियुक्ति नहीं

आंदोलनरत दिव्यांगों का कहना है कि 2011 की भर्ती में िदव्यांगों को 337 पदों पर नियुक्ति दी जानी थी। विभाग ने 324 को नियुक्ति दे दी लेकिन 13 पद अब भी खाली हैं। वहीं, जिन 28अभ्यर्थियों को कोटे के आधार पर या दोहरी विकलांगता के आधार पर पहले नियुक्ति दी गई, उन्हें नियुक्ति नहीं दी जा रही।

इन्हें दी नियुक्ति, बाद में बोले- आप नौकरी के योग्य नहीं

कमालुद्दीन, नटवरलाल, संतोष देवी, इंतजाम अली और जोधपुर मेडिकल कॉलेज में कार्यरत मनोज कुमार का चयन पहली सूची में दोहरी विकलांगता वाली श्रेणी में हुआ। लेकिन एक पैर विकलांगता का नियम आने के बाद इनसे कहा गया कि आप नौकरी के लिए योग्य नहीं हैं। सबका सवाल है, अगर हम योग्य नहीं तो फिर हमें ट्रेनिंग क्यों दी गई और नियम बदलने के बाद भी 30 अभ्यर्थियों को नियुक्ति क्यों दी गई?

सरकार ने नर्सिंग की फिर से भर्ती निकाली है जबकि पहली हुई भर्ती में मेरिट आए अभ्यर्थियों को अब तक नियुक्ति नहीं मिली। अब हम 13 दिन से धरने पर बैठे हैं। लेकिन विभाग का कोई अधिकारी उनकी सुध नहीं ले रहा है। -रतन लाल बैरवा, प्रदेश संयोजक, विकलांग आंदोलन संघर्ष समिति

इस मामले में कार्रवाई चल रही है, इसी महीने इसका समाधान हो जाएगा। -कालीचरण सराफ, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री

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