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चुनावी साल में संभावित विरोध को देख सरकार का यू टर्न

होटल कारपोरेशन की प्रापर्टी जयपुर के खासा कोठी, उदयपुर के आनंद भवन और राजस्थान पर्यटन विकास निगम के 42 होटलों,...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 03:45 AM IST

चुनावी साल में संभावित विरोध को देख सरकार का यू टर्न
होटल कारपोरेशन की प्रापर्टी जयपुर के खासा कोठी, उदयपुर के आनंद भवन और राजस्थान पर्यटन विकास निगम के 42 होटलों, मोटलों के बेचने या पीपीपी मोड़ पर देने के फैसले के कदम को सरकार ने चुपके से वापस खींच लिया है। पर्यटन निदेशालय से लेकर सचिवालय तक में होटलों और मोटलों को बेचने या पीपीपी मोड़ पर देने की फाइलों को डंप कर दिया गया है। माना जा रहा है कि चुनावी वर्ष में सरकार की ओर से रणनीति में यह बड़ा बदलाव किया गया है, जिससे कोई बड़ा विवाद खड़ा न होने पाए या फिर सरकार पर अपने लोगों को औने पौने दाम पर टूरिज्म की प्रापर्टी देने का आरोप न लग जाए।

सत्ता में आने के बाद से ही भाजपा ने आरटीडीसी के होटलों को बेचने के लिए प्लान बना लिया था। कैबिनेट ने इसकी मंजूरी भी दी। चार साल तक पर्यटन विभाग से लेकर सचिवालय तक में फाइलें गई। 15 होटलों, मोटलों को बेचने के लिए पर्यटन विभाग के अफसरों ने इसे घाटे तक में ले गए। घाटे में ले जाकर बंद कर दिया गया। आरटीडीसी के बहरोड जैसे मिडवे तक को बंद करा दिया गया, जो लगातार फायदे में चल रहा था। प्रदेश के कुल 42 होटल, मोटलों को बेचने की तैयारी थी। इसमें से 27 होटल, मोटल पहले से ही बंद चल रहे थे। सबसे चौंकाने वाला फैसला तब लिया गया जब जयपुर के खासाकोठी होटल और उदयपुर के आनंद भवन को पीपीपी मोड़ पर देने या बेचने की फैसला लिया गया। ये दोनों ही प्रापर्टी की खरबों रुपये की है।

जिस तरह से उपचुनाव में नतीजे आए है, उसको देखते हुए प्रदेश सरकार कोई भी ऐसा कदम उठाना नहीं चाहती, जिससे पब्लिक में गलत मैसेज जा पाए। इसी को ध्यान में रखते हुए चुनावी साल में सरकार ने खासा कोटी, आनंद भवन और आरटीडीसी के 42 होटल, मोटल को पीपीपी मोड पर देने वाली फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी गई है। इस पर अब कोई काम नहीं हो रहा।

खासा कोठी, आनंद भवन समेत आरटीडीसी के होटल-मोटल नहीं दिए जाएंगे पीपीपी मोड पर, टूरिज्म प्रापर्टी बेचने का कदम भी वापस

कंसल्टेंसी पर फूंके लाखों : आनंद भवन और खासा कोटी को पीपीपी मोड़ पर देने के लिए कंसल्टेंसी कराई गई थी। कंसल्टेंसी के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए गए। अब उस कंसल्टेंसी का अर्थ नहीं रहा गया है, जिससे होटल कारपोरेशन का लाखों रुपये बेकार साबित हो गया।

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