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घटिया दूध-छाछ पैकिंग फिल्म से बूथों पर पहुंच रही हैं 6 हजार थैलियां लीकेज

सरस डेयरी में तय क्वालिटी की दूध-छाछ डेयरियों में तय क्वालिटी की मिल्क पैकिंग फिल्म नहीं होने से सरस दूध की लीकेज...

Danik Bhaskar | May 18, 2018, 04:00 AM IST
सरस डेयरी में तय क्वालिटी की दूध-छाछ डेयरियों में तय क्वालिटी की मिल्क पैकिंग फिल्म नहीं होने से सरस दूध की लीकेज के मामले दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं। इससे शहर के उपभोक्ता से लेकर डेयरी बूथ संचालक परेशान हैं। घटिया पैकिंग फिल्म की वजह से शहर के करीब 4 हजार डेयरी बूथों पर हर दिन करीब 6 हजार थैलियां लीकेज पहुंच रही है। इसकी वजह है कि ठेकेदार तय मात्रा की मोटाई में फिल्म की सप्लाई नहीं करके कम-ज्यादा मोटाई की फिल्म सप्लाई कर रहे है। इससे मशीन में पैकिंग के दौरान थैलियों के ज्वाइंट ठीक से पैक नहीं हो रहे। हालात यह है कि अधिकारी कमिशन के चक्कर में सरकारी एजेंसी नेशनल डेयरी डवलपमेंट (एनडीडीबी) की शाखा इंडियन डेयरी मैकेनिकल कंपनी (आईडीएमसी ) से फिल्म नहीं खरीद रहे हैं। यहां पर थ्री डी फिल्म उपलब्ध है। टेंडर की भी जरूरत नहीं हैं।

तय नियमों के तहत ठेकेदार को सरस डेयरी संघों में मिल्क पैकिंग फिल्म 55 माइक्रोन की सप्लाई करनी चाहिए, जिसकी मोटाई प्लस-माइंस दो रहती है, लेकिन जिन कंपनियों को फिल्म सप्लाई का टेंडर दे रखा है वे 55 माइक्रोन की फिल्म में प्लस-माइंस 2 मोटाई की फिल्म सप्लाई कर रही है। ऐसे में फिल्म में एकरूपता नहीं होने से पैकिंग के दौरान मशीन ठीक से पैकिंग नहीं कर पाती। इस वजह से लीकेज बढ़ रहा है। यह मुद्दा कुछ दिन पहले हुई अधिकारियों की बैठक में सामने आया। बूथ संचालकों की बढ़ती लीकेज समस्या के बारे में उच्च अधिकारियों ने प्लांट मैनेजरों से चर्चा की तो उन्होंने घटिया फिल्म सप्लाई करने की बात कहीं।

मार्केट में 3डी फिल्म उपलब्ध, फिर भी पुराने ढर्रे पर

लीकेज पर नियंत्रण रखने के लिए मार्केट में 3 डी फिल्म उपलब्ध है। इसके बावजूद भी आरसीडीएफ अधिकारी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। वे थ्री डी फिल्म खरीद की अपेक्षा पुराने ठेकेदारों को फायादा पहुंचाने के लिए साधारण फिल्म के टेंडर कर रहे हैं। कई प्राइवेट डेयरियों 3 डी फिल्म में दूध-छाछ पैकिंग करके सप्लाई कर रही हैं। सूत्रों ने बताया कि यह सब कमिशन के खेल की वजह से हो रहा है। प्रदेश में दूध-छाछ पैकिंग के लिए हर साल करीब 65 करोड़ रुपए की फिल्म की खरीद होती है। इसमें से 3 प्रतिशत अधिकारियों की जेब में जाता है। यह राशि आरसीडीएफ से लेकर डेयरी अधिकारियों के बीच में बंटती है।