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थापर को वाइल्ड लाइफ ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की एडवाइजरी कमेटी का चेयरमैन बनाने का विरोध, वनमंत्री बोले- तालमेल बिठाने की जरूरत, वो तो पद छोड़ने को भी तैयार

वाल्मिक थापर को राजस्थान फॉरेस्ट एंड वाइल्ड लाइफ ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के लिए बनी एडवाइजरी कमेटी का चेयरमैन क्या...

Bhaskar News Network | Last Modified - Aug 10, 2018, 04:30 AM IST

  • थापर को वाइल्ड लाइफ ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की एडवाइजरी कमेटी का चेयरमैन बनाने 
का विरोध, वनमंत्री बोले- तालमेल बिठाने की जरूरत, वो तो पद छोड़ने को भी तैयार
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    वाल्मिक थापर को राजस्थान फॉरेस्ट एंड वाइल्ड लाइफ ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के लिए बनी एडवाइजरी कमेटी का चेयरमैन क्या बनाया, ब्यूरोक्रेसी से लेकर फॉरेस्ट-वाइल्ड लाइफ से जुड़े लोगों में घमासान मच गया। विरोध के स्वर सरकार तक पहुंचे। उन्होंने मसले पर थापर से भी बातचीत की। विरोध की वजह केवल आईएएस-आईएफएस को वाल्मिक के अधीन कमेटी में रखने भर का नहीं है, बल्कि प्रोफेशनल कार्यों के लिए उनके लीड करने को लेकर है, जिसमें सर्विस रूल्स, वाइल्ड लाइफ केसेज, प्रदेशभर की वाइल्ड लाइफ की जानकारी तक है, जिसमें पूर्व अफसरों का हाथ बेहतर मजबूत होता है। सबने कहा चेयरमैन के बजाए कमेटी में रखा जा सकता था, जहां वो भी अपनी बात रख पाते। असल में यह व्यक्ति विशेष को अतिरिक्त श्रेय देने की बात है। वाल्मिक थापर की पहचान रणथंभौर और बाघों को लेकर है। थापर विवाद पर कुछ नहीं बोले।

    ऑर्डर में अब सब उनके (वाल्मिक थापर) अधीन हो गए, जबकि उनका ऐसे कार्यों से वास्ता कम है। वो वाइल्ड लाइफ के जानकार होंगे, लेकिन ट्रेनिंग के काम में फॉरेस्ट के केस बनाने, एडमिनिस्ट्रेशन आदि बहुत बातें आती हैं। बेहतर होता कि किसी भूतपूर्व, भले ही दूसरे स्टेट के रिटायर्ड अफसरों को ले लेते और वो इसमें शामिल हो जाते। -यूएम सहाय, पूर्व पीसीसीएफ

    प्रोफेशनल काम के लिए नॉन प्रोफेशनल को मुखिया कैसे बना सकते हैं। अभी तक उनका साइंटिफिक पेपर भी पब्लिश नहीं हुआ है। ट्रेनिंग में सर्विस की कई बातें होती हैं, जो उनको नहीं पता। अच्छा होता किसी जुडीशियल, आईएएस या आईएफएस को चेयरमैन बनाते। -आरएन मेहरोत्रा, पूर्व पीसीसीएफ

    ऐसी संस्थाओं में प्रोफेशनल्स चाहिए जिनके पास क्वालिफिकेशन हो, खुद के हित नहीं हों, जो प्रबंधन को जानते हों। यहां बड़े प्रोफेशनल हैं, जो लीड कर सकते थे। -राजेश गोपाल, राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण के पूर्व सदस्य सचिव

    यह बोर्ड या कॉर्पोरेशन नहीं,जहां प्राइवेट लोग किसी को भी हांके। यह सरकारी संस्था है, जहां अफसर ट्रेंड होंगे। इसलिए यह गलत है। सिमरत संधू, वाइल्ड लाइफर और एक्टीविस्ट

    किसी को बिना मौका दिए, कैसे क्रिटिसाइज कर सकते हैं। वे वाइल्ड लाइफ के जानकर हैं, काम तो करने दीजिए। -सुनील मेहता, वाइल्ड लाइफर

    आपत्तियां आई, पर चेयरमैन का कोई इंट्रेस्ट नहीं : खींवसर

    मामला तकनीकी जानकार और हैरारकी में तालमेल का है। मेरे पास भी कुछ आपत्तियां आई हैं पर थापर जानकार तो हैं। हां, वरीयता अलग चीज होती है। फिर भी इस मसले पर बात हुई तो उन्होंने कहा अगर लोगों को आपत्ति है तो वो पद छोड़ने को तैयार हैं। उनको कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि वो सरकार से कुछ लेने के बजाए अपना टाइम और अनुभव ही देते हैं।

    वनमंत्री

    ट्रेनिंग में सिर्फ रणथंभौर की बात नहीं होनी : बीना काक

    कैसी विडंबना है कि वन अफसरों को वो लीड करेंगे जो इस विधा के जानकार नहीं है। ट्रेनिंग में सिर्फ रणथंभौर की बात नहीं होनी है। राजस्थान की तमाम वाइल्ड लाइफ, सर्विस रूल्स, मैनेजमेंट के बारे में वो कितना जानते हैं? और फिर ये इंस्टीट्यूट भी कांग्रेस सरकार में स्वीकृत हैं। लेकिन इनको लीड कराने का तरीका सही नहीं है।

    पूर्व वनमंत्री

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