श्रीजी खेड़ा और राणीधरा फली में 30 साल से अधिक उम्र की हर दूसरी महिला विधवा

4 वर्ष पहले
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खारी फली गांव के पोस राम (ऊपर), कालूराम (लेफ्ट), सुरेश (राइट) सिलिकोसिस बीमारी के कारण जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं। एक भाई कमलेश की मौत हो चुकी है। - Dainik Bhaskar
खारी फली गांव के पोस राम (ऊपर), कालूराम (लेफ्ट), सुरेश (राइट) सिलिकोसिस बीमारी के कारण जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं। एक भाई कमलेश की मौत हो चुकी है।
  • श्रीजी खेड़ा में 25 घर तो ऐसे हैं, जिनमें सिर्फ 4 आदमी और 22 विधवा महिलाएं हैं
  • कम उम्र में मौतों के कारण यह गांव इतना बदनाम हो चुका है कि यहां अब बच्चों की शादी भी नहीं होती
  • पूरे गांव में 30 साल की उम्र का कोई नौवान नहीं, राणीधरा में भी 50 साल से ज्यादा के सिर्फ दो लोग
  • पत्थरों की मीनाकारी के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध सिरोही का पिंडवाड़ा कस्बा बांट रहा सिलिकोसिस बीमारी

जयपुर. भीलवाड़ा के श्रीजी खेड़ा और सिरोही के राणीधरा फली गांव में 30 साल से अधिक उम्र की हर दूसरी महिला विधवा है। यहां 50 साल से अधिक उम्र के सिर्फ दो-दो बुजुर्ग जिंदा हैं। भीलवाड़ा जिला मुख्यालय से महज 40 किलोमीटर दूर 80 घरों की इस बस्ती में 80 विधवाएं हैं। 25 घर तो ऐसे हैं, जिनमें सिर्फ 4 आदमी हैं और 22 विधवा महिलाएं। पूरे गांव में 30 साल की उम्र का कोई नौजवान नजर नहीं आता। इसकी वजह है सिलिकोसिस बीमारी।

 

कम उम्र में मौतों के कारण यह गांव इतना बदनाम हो चुका है कि यहां अब बच्चों की शादी भी नहीं होती। इसी तरह सिरोही जिले के राणीधरा गांव में भी हर वक्त मातम का साया रहता है। कोई महीना ऐसा नहीं होता जब इस गांव में किसी न किसी व्यक्ति की मौत ना हो। रणधीरा के लोग सड़क, स्कूल, पानी और अस्पताल जैसी सुविधाओं की नहीं बल्कि ऐसे वक्त की आस करते हैं जिसमें मौतों का सिलसिला थम जाए। गांव में 25 घर हैं और 16 विधवा महिलाएं। यहां 50 साल से ज्यादा उम्र के दो बुजुर्ग बचे हैं - जीवा राम और चोपा राम। गांव के जवान बेटों की अर्थियां कंधों पर ढोते-ढोते दोनों पूरी तरह टूट चुके हैं।  

 

पत्थरों की मीनाकारी के लिए विश्वभर में अपनी पहचान रखने वाले सिरोही जिले के पिंडवाड़ा कस्बे का दूसरा चेहरा बहुत भयावह है। यह कस्बा हर साल सैकडों लोगों को सिलिकोसिस बीमारी भी बांट रहा है। तहसील की आमली ग्राम पंचायत के खारी फली गांव के चार सगे भाई पोस राम, सुरेश, कालूराम और कमलेश (33) को सिलिकोसिस बीमारी पिंडवाड़ा से ही मिली है। दूसरे नंबर के भाई कमलेश की मौत हो चुकी है तथा पोस राम (37), सुरेश (30) और कालूराम (23) जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं।

 

बताया जाता है कि चारों भाई पिंडवाड़ा इंडस्ट्रीयल एरिया में पिछले 10 साल से पत्थर घड़ाई का काम कर रहे थे। पिंडवाड़ा के अलावा ठेकेदार इन्हें कई जगहों पर पत्थर की मीनाकारी के लिए ले गए। एक साल पहले चारों एक साथ सिलिकोसिस से पीड़ित हुए। फली गांव में सिलिकोसिस से कई लोगों की मौत हो चुकी है। 


मौत बांट रही हैं खानें : प्रदेश में 25 हजार खदान में करीब 25 लाख मजदूर काम करते हैं। 20 जिले सिलिकोसिस प्रभावित हैं। फेफड़ों में संक्रमण के कारण होने वाली इस बीमारी की अधिकांश मामलों में पहचान नहीं हो पाती है। मेडिकल कॉलेजों में न्यूकोनियोसिस बोर्ड ही सिलिकोसिस की पुष्टि करता है। 80 फीसदी मरीजों की इस बोर्ड तक पहुंचने से पहले ही मौत हो जाती है। जिनकी पुष्टि नहीं हो पाई उनके परिजनों को मुआवजा नहीं मिल पाता है।  

 

तकनीकी ने बढ़ाई बीमारी : खानों में और पत्थर के कारखानों में नई तकनीकी की मशीनों के आने के बाद सिलिकोसिस की बीमारी में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। कारखानों में पत्थर की कटाई और छंटाई में काम आने वाली कटर और ग्राइंडर मशीनों के कारण पत्थरों पर जमा सिलिकन डाई ऑक्साइड और सिलिका क्रिस्टल बड़ी मात्रा में हवा में उड़ता है एवं सांस के जरिए सीधा मजदूर के फेफड़ों में चला जाता है। रेत के कण से भी 100 गुना छोटे सिलिका क्रिस्टल फेफड़ों में जमकर रक्त प्रवाह को बंद कर देते हैं और व्यक्ति धीरे-धीरे मौत की तरफ बढ़ने लगता है।