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डी डी वैष्णव, शिव वर्मा, जैसलमेर. राजस्थान में अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे इलाके की पहचान हमेशा से ही दुरूह रास्तों और पिछड़ेपन से होती रही है। मगर पिछले 15 सालों में ये तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। बाड़मेर में जमीन के नीचे तेल के भंडार मिलना तो यहां बस तरक्की की शुरुआत भर रही। तेज हवाओं और झुलसाते सूरज की विषमताओं को यहां लोगों ने तरक्की का रास्ता ही बना लिया। आज ये पूरा इलाका सोलर और विंड एनर्जी का हब बन चुका है। मगर तेल या रिन्यूएबल एनर्जी से जुड़े उद्योगों की वजह से रोजगार और समृद्धि ही नहीं आई, लोगों की सोच भी बदली है। गांव-ढाणियों तक बदलाव की ये बयार बहती दिखती है। सीमा से सटी ढाणियों में लोग बीएसएफ की मदद से सोलर एनर्जी को अपना रहे हैं। लोगों का जीवन स्तर ही बदल गया है।
ये दुबई नहीं बाड़मेर है...
2004 में पहली बार तेल मिलने के बाद बाड़मेर की तस्वीर लगातार बदली है। अब बाड़मेर से रोजाना 2.75 लाख बैरल प्रतिदिन तेल का उत्पादन हो रहा है, जो देश के घरेलू उत्पादन का 25% हैं। केयर्न ऑयल एंड गैस ने 2025 तक पूरे देश में घरेलू उत्पादन का 50% निकालने की तैयारी कर ली है। केयर्न के कुल 1500 कार्मिक मंगला ऑयल फील्ड में तैनात हैं। इनमें 150 से ज्यादा महिलाएं कार्यरत हैं। आने वाले समय में ये संख्या 30 फीसदी से ज्यादा करने की योजना है।
भड़ला सोलर पार्क जैसे बड़े सोलर एनर्जी प्लांट्स को तो सब जानते हैं, मगर सौर ऊर्जा ने सरहदी इलाके में हर स्तर पर जीवन को बदला है। ये तस्वीर अमीर की ढाणी की है। ऐसी ढाणियों में सोलर पैनल अब आम हैं। इनकी मदद से फूस की झोपड़ी में टीवी और पंखे भी चल रहे हैं।
सौर ऊर्जा उत्पादन में हम नंबर वन
देश में सौर ऊर्जा उत्पादन में राजस्थान पहले स्थान पर है। पूरे देश में 5 हजार मेगावाट से ज्यादा सौर ऊर्जा का उत्पादन होता है, इसमें राजस्थान की हिस्सेदारी 10 से 12% तक है। राजस्थान में रोजाना 2400 से 2500 लाख यूनिट बिजली की खपत हो रही है। इसमें 150 लाख यूनिट सोलर व 350 लाख यूनिट विंड का योगदान है।
4811 मेगावाट क्षमता के सोलर प्लांट, 25 हजार मेगावाट का लक्ष्य।
4310 मेगावाट क्षमता के विंड प्लांट, 8 हजार मेगावाट का लक्ष्य।
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