जिंदगी बचाने के लिए जागिए / देश में पांच साल से कम उम्र के 8.80 लाख बच्चाें की माैत, 4 करोड़ कुपाेषित

प्रतीकात्मक फोटो। प्रतीकात्मक फोटो।
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प्रतीकात्मक फोटो।प्रतीकात्मक फोटो।

  • बच्चाें काे बचाने के लिए राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति की जरूरत
  • देश को फ्री दवा जैसी स्कीमें देने वाला राजस्थान करे पहल, केंद्र-राज्य सरकारें नीति बनाएं

दैनिक भास्कर

Jan 06, 2020, 10:00 AM IST

जयपुर. राजस्थान सहित पूरे देश में हाे रही बच्चाें की माैताें ने सरकारी अस्पतालों की शिशु चिकित्सा व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब समय अा गया है कि बच्चों की जान बचाने और उनकी सेहत को लेकर राजनीति के बजाय राष्ट्रीय नीति तैयार की जाए।

शिशु व मातृ मृत्युदर राेकने के लिए दशकाें से चल रही याेजनाएं प्रभावहीन हैं। केंद्र व राज्य सरकारें इस बात से ही खुश हैं कि कुछ सुधार हाे रहा है, लेकिन बच्चाें की माैताें के जो आंकड़े सामने आ रहे हैं वे बेहद डरावने हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि 2018 में देश में पांच साल से कम उम्र वाले 8.80 लाख बच्चों की मौतें हुईं।

यूनिसेफ की चिल्ड्रन, फूड एंड न्यूट्रिशन को लेकर तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में पांच साल से कम उम्र के 4 कराेड़ से ज्यादा बच्चे या तो कुपोषित हैं या मोटापाग्रस्त हैं। साेशल वेलफेयर स्कीमाें के मामले में राजस्थान ने कई बार देश में पहल की है। यहां की मुफ्त दवा याेजना और जांच याेजना काे देशभर में सराहा गया।

इन याेजनाओं काे राजस्थान की देखादेखी कई राज्याें ने लागू किया। इसलिए काेटा से सबक लेकर चाइल्ड केयर पाॅलिसी काे लेकर भी राजस्थान पहल करे ताे पूरे देश के लिए यह बड़ा मैसेज जाएगा। केंद्र और सभी राज्य सरकाराें काे मिलकर शिशु व मातृ दर राेकने के लिए एक संयुक्त पाॅलिसी पर काम करना चाहिए जाे माैजूदा हेल्थ सेक्टर में बड़ा बदलाव पैदा कर सके।

बिहार, गुजरात, मप्र और राजस्थान में बच्चों की मौत के आंकड़े राष्ट्रीय औसत से ज्यादा

मध्यप्रदेश में बच्चाें की मृत्यु दर सबसे अधिक है। यहां अस्पताल में दाखिल हाेने वाले प्रति हजार पर 47 बच्चे दम ताेड़ देते हैं, जबकि असम, अरुणाचल ओडिशा, उत्तर प्रदेश व राजस्थान में बच्चों की मौतों के आंकड़े भी कम चिंताजनक नहीं हैं। भारत सरकार के सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे (एसआरएस) के मुताबिक बच्चों की मौतों के मामलों में मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान की स्थिति राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है।

एसआरएस के मुताबिक दिल्ली के सफदरगंज अस्पताल में जितने बच्चे भर्ती होते हैं उनमें से 10% की मौत होती हैं जबकि कोटा के जेके लोन अस्पताल में यह दर 5.61% ही है। बच्चों की मौतों का राष्ट्रीय औसत 9.2% है जबकि राजस्थान में यह औसत 10.6% है। बिहार, गुजरात और मध्यप्रदेश में भी बच्चों की मौतों के आकंड़े राष्ट्रीय औसत से ज्यादा हैं।

चाइना में बने उपकरण खरीदे, जांच होगी

प्रदेश के मेडिकल कालेजों में जिन इंफ्यूजन पंप और मल्टी पैरा मॅानिटर उपकरणों की मदद से नवजातों को बचाया जा सकता है, उन उपकरणों की खरीद में गड़बड़ी की आशंका है। जयपुर के जेके लोन सहित सभी मेडिकल कालेजों में मेड इन चाइना के इंफ्यूजन पंप, मल्टी पैरा मॅानिटर खरीदे गए हैं, जिनकी गुणवत्ता बेहद खराब होती है। इनकी मरम्मत में भी परेशानी हाेती है।

ऐसे में टेंडर प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हाे गए हैं कि ऐसी कौन सी शर्त जोड़ी गई, जिसके जरिए अफसरों ने इनकी खरीद की। इसके लिए कौन से अफसर जिम्मेदार हैं। जयपुर के जेके लोन में इंफ्यूजन पंप, मल्टी पैरा मॅानिटर शंघाई इंटरनेशनल होल्डिंग कार्पाेरेशन और इडान शंघाई इंटरनेशनल होल्डिंग कार्पाेरेशन से खरीदी गई है। दरअसल चाइना के उपकरण सस्ती दरों पर मिल जाते हैं, जिसके कारण अफसरों की ओर से ऐसी खरीद की गई है।    

जेके लोन : एचओडी को हटाया, ग्रीन कारपेट मामले में अधीक्षक पर होगी कार्रवाई
कोटा के जेके लाेन अस्पताल में बच्चाें की माैत में लापरवाही का दाेषी मानते हुए चिकित्सा मंत्री डाॅ. रघु शर्मा ने शिशु राेग विभाग के एचअाेडी डॉ. अमृतलाल बैरवा को पद से हटा दिया है। उनकी जगह डॉ. जगदीश सिंह को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है।

उधर, चिकित्सा मंत्री के दाैरे के दाैरान ग्रीन कारपेट बिछाने के मामले में अस्पताल अधीक्षक एससी दुलारा पर भी कार्रवाई की तैयारी है। रविवार को जिला कलेक्टर अोम कसेरा ने अस्पताल के निरीक्षण के बाद कहा कि यहां बच्चों के लिए 150 बैड बढ़ेंगे। कुछ वार्ड गंभीर बच्चों के इलाज के लिए एनआईसीयू व पीआईसीयू के बनाए जाएंगेे।

सूचना मिली है कि राज्य के कई मेडिकल कालेजों में मेड इन चाइना के उपकरण खरीदे गए हैं, जिनकी गुणवत्ता खराब होती है। रिपोर्ट मंगाई है। इसके बाद जरूरत पड़ी तो एक्शन भी लिया जाएगा।
वैभव गालरिया, सचिव चिकित्सा शिक्षा
जेके लोन अस्पताल के स्तर पर एक भी खरीदारी नहीं की गई है। उपकरण और मशीनों की खरीदारी एसएमएस मेडिकल कालेज के स्तर पर की गई है।
डा.अशोक गुप्ता, अधीक्षक जेके लोन अस्पताल

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