चिपको आंदोलन पर 20 साल में लिखी ‘हरी भरी उम्मीद’ बुक का हुआ विमोचन

Jaipur News - जन आंदोलन आज की सबसे बड़ी ऊर्जा व ताप : पाठक जनतंत्र या पॉलिटिकल कुर्सी को बचाए रखने के लिए जन आंदोलन सबसे बड़ी...

Jan 24, 2020, 08:31 AM IST
जन आंदोलन आज की सबसे बड़ी ऊर्जा व ताप : पाठक

जनतंत्र या पॉलिटिकल कुर्सी को बचाए रखने के लिए जन आंदोलन सबसे बड़ी ऊर्जा है। यह ना सिर्फ नेताओं को, बल्कि समाज और इंडिविजुअल सिटीजन को एक खास तरह का परिवेश और तमीज़ सिखाता है। क्योंकि जनतंत्र को चलाने के लिए नेताओं और पार्टियों को ही ठेका नहीं मिला हुआ है। अगर किसी समाज की व्यवस्था गड़बडा रही है, वहां जन आंदोलन अहम भूमिका निभाता है। लेकिन कोई भी जन आंदोलन 100 परसेंट सोल्यूशन नहीं लाते है, लेकिन एक उम्मीद जगा जाता है। यह कहना था उत्तराखंड के नामी इतिहासकार व लेखक शेखर पाठक का। मनीषा चौधरी और दैनिक भास्कर स्टेट एडिटर लक्ष्मी प्रसाद पंत के साथ शेखर पाठक ने पहाड़ : वॉकिंग द हिमालयाज पहाड़ विषय पर चर्चा की।

बुढ़ापे के बजाय बचपन में करें हिमालय की यात्रा

शेखर पाठक ने कहा, हिंदुओं में बूढ़े लोगों को तीर्थ यात्रा पर ले जाए जाने की गलत परंपरा है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा लोग बच्चों के साथ करते ही ठीक उसी तरह हिमालय की यह तीर्थ यात्रा भी बचपन में होनी चाहिए। अगर यह यात्रा बुढ़ापे के बजाय बचपन में की जाए तो लोगों को अपनी सभ्यताओं से जोड़ने के साथ-साथ काफी कुछ सिखाकर जाएगी।

‘हिमालय ने हमेशा प्राकृतिक आपदा के तौर पर बुलाया’

दैनिक भास्कर के स्टेट एडिटर एलपी पंत ने कहा, हिमालय के कई चेहरे हैं लेकिन मैंने हमेशा हिमालय को बुरे चेहरे जैसे प्राकृतिक आपदा और दुर्घटनाओं के रूप में देखा है। आमतौर पर लोगों को हिमालय अपनी खूबसूरती के वजह से बुलाता है, लेकिन मुझे हमेशा आपदा के तौर पर बुलाया है। बचपन में पीपल के पेड़ की टहनी को हिलता देखते थे तो लगता था इसमें किसी बुरी आत्मा का साया है। इससे लोग जंगलों के पास जाने से भी डरते थे। लेकिन आज के इंसान ने उसी पीपल के पेड़ को काटकर अपनी ड्राइंग रूम में सजा दिया है। यह कोई पीपल की मौत नहीं, यह एक समाज के प्रतिनिधि इकाई की मौत है।

शेखर पाठक द्वारा उत्तराखंड पर लिखित ‘हरी भरी उम्मीद’ बुक की जेएलएफ के पहले दिन लॉन्चिंग हुई। 600 पेज की इस बुक को लेखक ने 20 साल में लिखा है, जो चिपको आंदोलन में शामिल हुए लोगों के संघर्ष को बताती है। लेखक ने नमिता गोखले के साथ चर्चा करते हुए कहा, 1920 में हमारे पूर्वजों ने चिपको आंदोलन शुरू करके जंगलों को बचाने की पहल की थी। यह एक ऐसा आंदोलन साबित हुआ जिसमें युवाओं की ही नहीं महिलाओं की भी अहम भूमिका रही।

पहाड़: वॉकिंग द हिमालयाज पहाड़

लेखक व इतिहासकार शेखर पाठक, मनीषा चौधरी के साथ एलपी पंत

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