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एक्रेलिक रंगाें से कैनवास पर बनाई रंगावली

एक वर्ष पहले
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Painting Exhibition

हर चिन्ह के अपने अर्थ : यहां प्रदर्शित कृतियां देखने में फाैरी ताैर पर अाध्यात्मिक अाैर कलात्मक अनुभूति देती हैं। लेकिन इनमें काम में लिए गए चिन्हाें के अपने अर्थ हैं। डाॅट गणपति, हाॅरीजेंटल लाइनें मदर अर्थ के एलीमेंट हैं, हाफ सर्किल चंद्रमा की अनुभूति करवाता हुअा प्यार अाैर सुरक्षा का भाव देता है। सर्किल सूर्य की अनुभूति करवाता हुअा बाैद्धिकता अाैर गर्मजाेशी, अाठ पत्तियाें वाली कमल की अाकृति कांस्टेंट फर्टिलिटी, गाय का चिन्ह पाेषाहार अाैर देखभाल तथा पेंटागन यानि पंचकाेण का चिन्ह इसमें पंचमहाभूत की अनुभूति करवाता है। एग्जीबिशन 16 मार्च तक चलेगी।


पिसे चावल, सिंदूर, हल्दी से बनती है परंपरागत रंगोली : रंगाेली सामान्यतः त्योहार, व्रत, पूजा, उत्सव विवाह आदि शुभ अवसरों पर बनाई जाती है। इसमें साधारण ज्यामितिक आकार अाैर देवी देवताओं की आकृतियां प्रमुख रूप से बनाई जाती हैं। इसके लिए प्रयोग में लाए जाने वाले पारंपरिक रंगों में पिसा हुआ सूखा या गीला चावल, सिंदूर, रोली, हल्दी, सूखा आटा और अन्य प्राकृतिक रंगो का प्रयोग किया जाता है परन्तु यहां प्रदर्शित कृतियां कलाकाराें ने कैनवास पर एक्रेलिक रंगाें के माध्यम से बनाई हैं।

जवाहर कला केंद्र की पारिजात आर्ट
गैलरी में शुक्रवार से भारत की प्राचीन फ्लाेर अार्ट रंगावली की अाकृतियाें पर अाधारित तीन दिवसीय पेंटिंग
एग्जीबिशन की शुरुअात हुई। इसमें
फाइन आर्ट पेंटर डॉ. भारती माटे और स्प्रिचुअल पेंटर सुनील बलकावडे ने इस कला के फर्श अाैर दीवाराें पर उकेरे जाने वाली अाकृतियाें काे कैनवास पर उकेर कर इसे चित्रकला की एक विधा के रूप में चिन्हित किया।

कलाकाराें ने बताया कि इन पेंटिंग्स का मकसद दुनिया में सुख और समृद्धि लाना है। आज के दौर में तनाव और अवसाद की स्थिति में यह पेंटिंग्स मन को शांत करने और देखने वाले को आध्यात्मिक ऊर्जा देने का काम करती है।
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