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दाैरे सियासत का नया तर्जे वफा है, पत्थर जाे अाके मेरी छत पे गिरा है
सिटी रिपाेर्टर . जयपुर
विश्व महिला दिवस के मैके पर रविवार काे रवींद्र मंच पर राजस्थान उर्दू अकादमी की अाेर से महिलाओं का अखिल भारतीय मुशायरा आयोजित किया गया। कुल हिंद ख्वातीन मुशायरा ‘खुशबुअाें की शाम ख्वातीन के नाम’ में प्रभा ठाकुर, शबीना अदीब, हिना तैमूरी, रेहाना शाहीन, अना देहलवी, सबा बलरामपुरी, जयपुर की शाेभा चंदर पारीक अाैर डाॅ. जीनत कैफी सहित देश की 18 ख्यातनाम शायराअाें ने कलाम पेश किए। कला एवं संस्कृति मंत्री डाॅ. बी.डी. कल्ला समारोह के मुख्य अतिथि थे। विधायक प्रशांत बैरवा ने समारोह का उद्घाटन किया, अध्यक्षता कला, साहित्य एवं संस्कृति विभाग की प्रमुख शासन सचिव श्रेया गुहा ने की। चुनिंदा रचनाअाें की पंक्तियां....
डाॅ. प्रभा ठाकुर ने ‘इस जिंदगी का शुक्रिया, ये दाे घड़ी का सपना सही, ये चार दिन का नगमा सही, गम ही सही, मुस्कुराती ताे है। थाेड़ा भला, तकदीर का है सिलसिला, जाे भी दिया, वाे ही मिला, फिर जिंदगी से कैस गिला। अमृत यही, मदिरा यही, विष मान लाे, विष ही सही। ये जाम ताे पीना ही है, हंस के जिए ताे जीना भी है।’ रचना सुनाई।
डाॅ. क़मर सुरूर ने ‘दिल का क्या हाल है खबर रखना, ख्वाब आकर उड़ा ना ले जाए अपनी नींदों को बांध कर रखना, काम आएगी सिर्फ तन्हाई चंद यादों को हमसफर रखना, कितना मुश्किल है इस जमाने में, तेरा एहसान उम्र भर रखना, जिसकी दूरी अजाब होती है, फासला उस से मुख्तसर रखना, अच्छे लगते हैं ग़म में आंसू भी उन चरागों को ऐ क़मर रखना।’ रचना पेश की।
जयपुर की शाेभा चंदर पारीक ने ‘ये दाैरे सियासत का नया तर्जे वफा है, पत्थर जाे अभी अाके मेरी छत पे गिरा है। मुमकिन है किरन फूट पड़े अापके घर में, जलता हुअा रहने दाे किसी घर का दिया है। क्यूं अापकी अांखाें से निकल अाए हैं अांसू मैंने ताे तबाही का फकत जिक्र किया है...’ कविता पेश की।
वहीं सचदेव ने ‘ख़ुशी से कौन उठाये है ये हयात का बोझ, किसे दबाये हुए हैं ख़ुद उसकी ज़ात का बोझ। ज़रा बताओ तो ये कौन सिन्फ़ नाज़ुक है, ये किसके शानो पे रखा है क़ायनात का बोझ। बताओ पैदा हुआ है ये आदमी किससे, हर एक रूह को मिलती हैं ज़िंदगी किससे। हमेशा रखती रही हैं जो लाज रिश्तों की, हर एक दिल को मयस्सर है हर ख़ुशी किससे। ग़मे हयात को अपना पिला रही हैं लहू, यूं क़तरा क़तरा वो अपना बहा रही है लहू’ पंक्तियां सुनाईं।
फाैजिया रबाब ने ‘बेटियां चाहताें की प्यासी हैं, ये पराए चमन की वासी हैं। मारना मत जनम से पहले ही, बाेझ इनकाे कभी समझना मत। बेटियां बेवफा नहीं हाेतीं, ये कभी भी खफा नहीं हाेतीं’ सनाकर वाहवाही लूटी।
इन्होंने भी सुनाईं रचनाएं
शबाना शबनम उज्जैन, वसीम राशिद दिल्ली, अलीना इतरत नाेएडा, रेनू नय्यर जालंधर, ज्याेति अाजाद खत्री ग्वालियर, मेहर माही बांसवाड़ा ने भी अपनी रचनाएं पेश कीं। मुशायरे का संचालन अमरावती के जनाब अबरार काशिफ ने किया।