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प्रेम भाया महोत्सव में साकार होगी जयपुर की ढूंढाड़ी विरासत
जयपुर में 80 साल पहले पं. युगल किशोर शास्त्री के ढूंढाड़ी भाषा और विरासत को दोहों और पदों में सहजने के कार्य को प्रेम भाया महोत्सव में साकार किया जाएगा।
इस प्रेमभाया महोत्सव के अंतर्गत 80वां त्रि-दिवसीय भक्ति-संगीत समारोह 16,17 व 18 मार्च को ‘युगल कुटीर‘ जयलाल मुंशी का रास्ता, चांदपोल बाजार में आयोजित होगा। हैरिटेज सिटी जयपुर को इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए यहां की अद्भुत नियोजन व स्थापत्य कला के साथ ही परंपरागत तीज-त्यौहार, धार्मिक-सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां और यहां के आदर्श-उच्च कोटि के संत मनीषी एवं विद्वान, महान संगीतज्ञ कलाकारों की अनुकरणीय साधना का भी महानतम योगदान है।
इन सबने इस विश्व प्रसिद्ध नगरी के महात्म्य में चार चांद लगाए हैं। श्रीप्रेमभाया के दरबार में संगीतमय हाजिरी लगाने देश-प्रदेश के कोने-कोने से संगीत-नृत्य विद्वान पहुंचते हैं।
श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप को दिया ढूंढाड़ी में प्रेमभाया सरकार का नाम
भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक पं. शास्त्री ने अपने आराध्य को ढूंढाड़ी भाषा में ‘श्री प्रेमभाया सरकार‘ नाम देकर 1940 में ‘बाल स्वरूप‘ को चित्तमय उतारकर निश्च्छल प्रेम की जनचेतना प्रज्जवलित की। वह जनचेतना 80 साल बाद भी संपूर्ण समाज को आलौकिक कर रही है। तब शीतला अष्टमी पर शुरू किया गया त्रि-दिवसीय भक्ति-संगीत समारोह के माध्यम से जयपुर का ’श्री प्रेमभाया महोत्सव’ ऐसा आयोजन बन गया जिसकी प्रतीक्षा जयपुर ही नहीं बल्कि दे-दुनिया में अपने कर्म क्षेत्र में व्यस्त हर क्षेत्र के लोगों को रहती है। श्रीप्रेमभाया के दरबार में संगीतमय हाजिरी लगाने देश-प्रदेश के कोने-कोने से संगीत-नृत्य विद्वान पहुंचते हैं।
13 वर्ष की आयु में ही बहाई भक्ति रस मार्ग की सलिला
ऐसे ही सहज सरल और कृष्ण भक्ति के आदर्श संवाहक भक्त पं. युगल किशोर शास्त्री ने पुरानी बस्ती में होली टीबा स्थित ‘युगल कुटीर‘ जयलाल मुंशी का रास्ता में राजवैद्य पं. गणेश नारायण शास्त्री के यहां वर्ष 1916 में वैशाख कृष्णा द्वादशी, शनिवार को जन्म लिया। भक्ति तपोनिष्ठ संस्कृत एवं आयुर्वेद विद्वान युगल किशोर जी ने अपनी जन्मभूमि जयपुर नगरी में आजादी के कालखंड में समाज को संगठित एवं संकलित करने के लिए भक्ति रस मार्ग की सलिला बहाई। उस भक्ति रस गंगा आज आठ दशक बाद ढूंढ़ाड़ के लाखों भक्तगण इसमें डुबकियां लगा रहे हैं। 13 वर्ष की आयु में बनारस से संस्कृत की प्रथमा परीक्षा उत्तीर्ण कर अपने आगम जीवन को बालक ‘युगल‘ ने होनहार बिरवान के होत चिकने पात के रूप में साकार कर दिया था।