उपहार ऐसा हो कि अंदर का बचपन जाग जाए

Jaipur News - एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु [[email protected]] ब हुत साल पहले जब मैं अपने दादा-दादी से मिलने गांव गया था, तो मैं उनके लिए...

Feb 10, 2020, 08:20 AM IST
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु [[email protected]]

ब हुत साल पहले जब मैं अपने दादा-दादी से मिलने गांव गया था, तो मैं उनके लिए स्ट्रॉलर (व्हील वाला सूटकेस) लेकर गया था ताकि उन्हें सफर करने में आसानी हो। उस समय देश के किसी भी गांव की तरह मेरे गांव में भी बिजली गुल रहा करती थी। इसलिए मैं जिस दिन पहुंचा था, उस दिन सो नहीं पा रहा था और करवटें बदल रहा था। तभी मैंने दादाजी को अपने बिस्तर से उठकर सूटकेस देखते हुए देखा, जो मैं उनके लिए लाया था। मैंने तय किया कि मैं ऐसे ही लेटा रहूंगा, जैसे सो रहा हूं। मैं 82 वर्षीय बुजुर्ग को बच्चों जैसी हरकतें करते देखना चाहता था। उन्होंने सूटकेस दो बार खोला और बंद किया। उसे चारों तरफ से देखा और उसे जमीन पर रखा। उन्होंने हैंडल खींचा तो वह एकदम से बाहर आ गया। वे एक पल के लिए डर गए। हालांकि उन्हें यह देखकर बड़ा मजा आया कि हैंडल से सूटकेस को खींचना कितना आसान है। उन्होंने कम से कम तीन बार उसे कमरे में ऊपर-नीचे खींचा। उन्होंने ऐसा धीरे-धीरे किया ताकि मैं उठ न जाऊं। अपने इस अभ्यास सत्र से संतुष्ट होकर उन्होंने सूटकेस वापस रखने का फैसला लिया। लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि बटन दबाकर हैंडल को वापस अंदर कैसे किया जाता है। वह बटन जो आमतौर पर हैंडल के बीच में होता है। अगले 20 मिनट के लिए वे टेंपररी मैकेनिक बन गए। लेकिन फिर उन्होंने सूटकेस खड़ी स्थिति में ही रख दिया क्योंकि उन्हें बटन नहीं मिल पाया था। उस दिन मैंने उनके चेहरे पर दो चीजें देखीं— 1. किसी बच्चे की तरह वे अपने नए खिलौने को लेकर, उसे खोलने, बंद करने को लेकर उत्साहित थे और 2. वे डर रहे थे कि उन्होंने उसे कहीं खराब तो नहीं कर दिया और इसलिए दुखी भी हो रहे थे। मैं बुजुर्ग व्यक्ति की बच्चे जैसी मासूमियत देखकर मुस्कुराया और फिर सो गया। अगली सुबह मैंने ऐसे बर्ताव किया जैसे रात में कुछ देखा ही नहीं। वह ‘बच्चा’ फिर मेरे पास आया, यह जानने के लिए कि हैंडल कैसे बंद होता है। बाद में उन्होंने मुझसे कहा कि क्या मैं कपड़े का कवर ला सकता हूं, ताकि ट्रेन की सीट के नीचे सूटकेस रखने पर उसमें निशान न पड़ें। मैं स्थानीय बाजार से ऐसा कवर ले आया और उन्होंने तुरंत सूटकेस पर इसे चढ़ा दिया।

मुझे यह घटना तब याद आई जब मैंने अहमदाबाद के जीवन संध्या ओल्ड एज होम के चार बुजुर्गों के बारे में पढ़ा, जो क्रूज से सिंगापुर और मलेशिया की यात्रा करने जा रहे हैं। यह उनकी पहली विदेश यात्रा है। वे भी कुछ ऐसे ही सवाल पूछ रहे हैं। जैसे ‘फाइव-स्टार होटल तैर कैसे सकता है’ या ‘हम ट्रॉली को लेकर कैसे घूम सकते हैं, जैसा फिल्मों में दिखाते हैं?’ उनकी 20 से 28 फरवरी को हो रही इस ट्रिप का पूरा खर्चा एक एनआरआई द्वारा चलाया जा रहा इंटरनेशनल फाउंडेशन उठा रहा है। ट्रैवल बैग से लेकर पासपोर्ट, वीजा, खाना और रहने तक की सारी व्यवस्थाएं रिजवान फाउंजेशन ने की हैं। इसका हेडक्वार्टर ईस्ट अफ्रीका में है और इसे एनआरआई रिजवान अदातिया चला रहे हैं। वृद्धाश्रम के ट्रस्टी ने चारों बुजुर्गों का इस ट्रिप के लिए चयन किया है। उन्हें उनकी अच्छी सेहत के अलावा उनके द्वारा की गई आश्रम की सेवा और उनके मददगार स्वभाव को देखते हुए इनाम में यह ट्रिप दी गई है। आश्रम के बाकी 173 साथी उनके लिए बहुत खुश हैं। सभी 177 बुजुर्ग ऐसे हैं जिन्होंने अपनी जवानी का सारा आनंद बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए त्याग दिया। ये कभी प्लेन में भी नहीं बैठे थे। फिर पिछले साल सभी 177 बुजुर्गों ने प्लेन से मुंबई तक का सफर किया। जिन बुजुर्गों को उनके परिवारों ने जीवन की शाम के दौर में अकेला छोड़ दिया था, उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वे विदेश यात्रा पर जाएंगे। इन चार बुजुर्गों में दिनेश मिस्त्री (71), मंजुला नायक (67), हसुमति उपाध्याय (66) और प्रवीण पांचाल (69) शामिल हैं। इन यात्रियों को नए ट्रॉली बैग दिए गए हैं और चूंकि ये सामान उनके लिए नए हैं, मुझे बताया गया है कि वे अब भी इन्हें इस्तेमाल करना सीख रहे हैं।

फंडा यह है कि उपहार ऐसा होना चाहिए जो इसे पाने वाले के अंदर के बच्चे को जगा दे। तभी यह उपहार सबसे उपयुक्त उपहार कहलाएगा। वरना यह महज औपचारिकता बनकर रह जाएगा।

 मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए 9190000071 पर मिस्ड कॉल करें।

मैनेजमेन्ट फंडा**

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