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कैंप लगते ही हुआ था विरोध, अब कोर्ट आदेशों की अवहेलना व घाटे पर विवाद
मुख्यमंत्री गहलोत ने बीजेपी के कार्यकाल में सवाल भी उठाए थे
राज्य सरकार ने 29 जनवरी को पृथ्वीराज नगर में नियमन, विकास शुल्क को लेकर जो आदेश किए हैं, उन पर विवाद तूल पकड़ रहे हैं। दरों और भूमाफियाओं के संरक्षण के आरोपों पर कई दिन से पृथ्वीराज नगर में विरोध प्रदर्शन हुए हैं।
अब मामले में मुख्यमंत्री को शिकायत भेज जांच की मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि पृथ्वीराज नगर योजना के संबंध में न्यायालय के आदेश के बाद भी सरकारी भूमि मान ‘सुनियोजित विकास’ के निर्णय पारित किए हैं। इसके विपरीत 29 अक्टूबर 2010 के डीबी के आदेश मुताबिक पृथ्वीराज नगर की करीब 11 हजार बीघा भूमि पर किसानों व गृह निर्माण सहकारी समितियों का कोई हक नहीं माना गया है, बल्कि राज्य सरकार द्वारा उक्त भूमि को अधिग्रहण मुक्त करने की कार्यवाही को अवैध करार दिया गया है।
हाईकोर्ट तक पहुंचे मामले में पृथ्वीराज नगर के नियमन में प्रचलित दरों से 13 हजार करोड़ के राजस्व हानि मानते हुए नियमन दरों में डीएलसी के चार से पांच गुना की दर पर नियमन का प्रस्ताव किया था।
इस पर हाईकोर्ट ने किसी भी प्रकार के नियमन पर रोक लगाते हुए निर्णय पारित किया गया, जिसको विरुद्ध राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई, जो विचाराधीन है। ऐसे में नगरीय विकास विभाग व जेडीए द्वारा की जा रही नियमन कार्रवाई न्यायालय के आदेश की अवहेलना है। वहीं राज्य सरकार पर अदालत की अवमानना कार्रवाई होने की संभावना है, जिसमें 70:30 अनुपात में नियमन भी शामिल है।
लोक संपत्ति संरक्षण समिति के अध्यक्ष रविंद्र सिंह ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि पृथ्वीराज नगर नियमन में जेडीए द्वारा लगातार गृह निर्माण सहकारी समितियों द्वारा फर्जी व बैक डेट पट्टों के अलावा आधे अधूरे अनुबंधों के आधार पर नियमन कर पट्टे दिए जा रहे हैं, जो कि जांच का विषय है। जबकि इस संबंध में खुद मुख्यमंत्री गहलोत ने ही बीजेपी सरकार के कार्यकाल में सवाल भी उठाए थे।
नुकसान-विवादों का गणित
{11 हजार बीघा भूमि का 70:30 अनुपात में नियमन से 7700 बीघा भूमि विक्रय योग्य होती है। फिलहाल पी-आरएन में 20000 से 40000 प्रति वर्ग गज का बाजार भाव है। अगर 20000 प्रति गज के न्यूनतम से भी गणना की जाए तो (7700गुणा 3000 गुणा20000 बराबर 46200 करोड़ होता है।) सामने आ जाएगा।
{सरकार के महाअधिवक्ता एम एस सिंघवी द्वारा मास्टर प्लान केस में न्याय मित्र रहते 13 हजार करोड़ का राजस्व नुकसान की बात कही गई थी, जिसे कोर्ट ने 15 दिसंबर 2018 के आदेश पैरा 18 में लिखा है।
{ऐसे में सरकार का 29 जनवरी 2020 का नियमन आदेश कोर्ट की अवमानना है, जिसमें 70:30 अनुपात में नियमन किया जा रहा है, जबकि कोर्ट ने कोई भी जोनल प्लान बनाए बिना नियमन पर रोक लगाई हुई थी। जेडीए गलत जोनल प्लान बना इस अनुपात में नियमन कर रहा है, कोई भी जोनल प्लान 60:40 में ही वैद्य है। 70:30 में जोनल प्लान बनाना संभव नहीं है। 11 हजार बीघा भूमि को सरकारी माना गया है।