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राजस्थान विधानसभा। राजस्थान विधानसभा।
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राजस्थान विधानसभा।राजस्थान विधानसभा।

  • 1952 : पहले चुनाव में दो मुस्लिम विधायक चुने गए थे, वहीं 2013 में भी सिर्फ दो 
     

Dainik Bhaskar

Nov 11, 2018, 09:49 AM IST

जयपुर। जरा इन दोनों पर गौर करें। 1- राजधानी जयपुर के सुभाष चौक के पास मुसलमान बहुल मेहरों की नदी मौहल्ला। सीवर के मेन होलों से निकलते बदबूदार पानी ने सड़क को सडांध मारती नदी का रूप दे दिया है। कचरे के ढेर ने आधी सडक दबा ली है। जहां चंद बकरियां दो दाने तलाशने की मशक्कत कर रही हैं। 
 

2- सन 1952 का पहला विधानसभा चुनाव

  1. दो मुसलमान विधायक बने। भरतपुर के कामां से मो. इब्राहिम और जयपुर ए सीट से शाह अलीमुद्दीन। दोनों कांग्रेस के। 2013 का पिछला चुनाव मात्र दो मुसलमान ही विधान सभा पहुंचे। डीडवाना से यूनुस खां और नागौर से हबीबुर्रहमान। दोनों भाजपा के।

  2. यह दोनों राजस्थान के मुसलमानों के मसाइल और सियासत की तस्वीर जैसे हैं। सवाल उठता है कि क्या आजादी के सात दशक बाद भी मुसलमान सियासत में अपने मुकाम की तलाश में नजर आ रहा है? अशिक्षा, बेरोजगारी, चिकित्सा के अभाव से लेकर पीने के पानी जैसी रोज की समस्याओं से जूझता यह वर्ग क्या आज नेतृत्वहीन वोट बैंक बनकर ही रह गया है?

  3. केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकारें आने के बाद मुसलमानों के हालात कैसे रहे हैं? यह सवाल आज नजर आ रहे हैं। मुंशी रामदासजी के रास्ते के रहने वाले सलीम बाबा कहते हैं- "कोई पार्टी निहाल नहीं करती। वोट मांगने सब आ जाते हैं, उसके बाद कोई नहीं आता। चाहे मुसलमानों के ही नेता क्यों न हों।" 
     

  4. जयपुर ही नहीं राजस्थान भर में मुसलमानों की स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। सच्चर कमेटी ने तो मुसलमानों की हालत एससी से भी बदतर मानी है। जमाते इस्लामी हिन्द के मीडिया सैक्रेटरी डॉ. इकबाल बताते है- "मुसलमान आज भी वोट बैंक ही हैं। हमारे मुद्दों पर कोई बात नहीं करना चाहता।

  5. आज भी हायर एजूकेशन में कम्युनिटी का एक-डेढ प्रतिशत ही पहुंच पाता है।" मिल्ली काउंसिल राजस्थान के जनरल सैक्रेटरी "अब्दुल कय्यूम अख्तर बताते हैं कि शिक्षा में मुसलमानों ही हालत बहुत खराब है। सैकंड्री लेवल पर तो हमारी कौम में ड्राप आउट 24% से ज्यादा है।" 

  6. राजस्थान में मुसलमान करीब 10%हैं। जयपुर में आबादी 14 लाख बताई जाती है। करीब 30 सीटों पर इनकी भूमिका निर्णायक है। लेकिन प्रतिनिधित्व में मुसलमान उसी दो की न्यूनतम संख्या पर खड़ा है जहां से 1952 में उसका सियासी सफर शुरू हुआ था। एक मुख्यमंत्री बरकतुल्ला खां सहित अब तक करीब 90 मुसलमान विधायक चुने जा चुके हैं, जिनमें सबसे ज्यादा संख्या कांग्रेस के विधायकों की है।

  7. सर्वाधिक 13 मुसलमान विधायक 1998 में चुने गए थे। कामां, फतेहपुर, सवाईमाधोपुर, तिजारा, मकराना, पुष्कर, मूंडवा, मसूदा, नागौर, चौहटन, जौहरी बाजार सीटें मुसलमानों की प्रमुख रही हैं। लेकिन इन चुनावों में मुसलमान भावी दिशा को लेकर असमंजस में है। जहां केंद्र में भाजपा आने के बाद वह असुरक्षित महसूस कर रहा है वहीं कांग्रेस के सॉफ्ट हिन्दुत्व ने इस असमंजस को और गहरा दिया है। 

  8. जमाते इस्लामी हिन्द राजस्थान के जनरल सैक्रेटरी नाजीमुद्दीन कहते हैं- "इस वक्त जो नफरत का माहौल है वह मुसलमानों के लिए ही नहीं देश के लिए नुकसान देह है।" डॉ. इकबाल कहते हैं- "आज मुसलमान असुरक्षा के वातावरण में जी रहा है। कांग्रेस से मायूस है तो तीसरा विकल्प भी नहीं है।" समग्र सेवा संघ के सवाई सिंह कहते हैं- "धर्म के नाम पर वोटों के ध्रुवीकरण की जो कोशिशें हो रही हैं वो देश और समाज के हित में नहीं हैं।" 

  9. नाजिमुद्दीन का मानना है कि "कौम में मसाइल इतने हैं कि आम मुसलमान को उनसे हटकर सोचने का मौका ही नहीं मिलता। हमदर्दी तो सभी पार्टियां भरती हैं, लेकिन करता कोई नहीं।" डॉ. इकबाल कहते हैं- "हमारे मुद्दे पर बात सभी करते हैं, हल कोई नहीं करना चाहता। वोट सबको चाहिए।" 

  10. मुसलमानों में जो नेता आगे आए उन्होने भी कौम के विकास पर ध्यान नहीं दिया। हां, चिंता जाहिर सभी करते हैं। सौ साल पहले मशहूर शायर अकबर इलाहबादी सही फरमा गए थे- कौम के गम में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ। 

     

    स्टोरी : कपिल भट्‌ट

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