--Advertisement--

राजस्थान चुनाव / रियासत काल से अब तक सपना ही बनी हुई है टोंक के लिए रेल



Rajasthan polls : Tonk still awaits for rail
X
Rajasthan polls : Tonk still awaits for rail

हर चुनाव में रेल के लिए होते हैं वादे

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2018, 12:54 PM IST

टोंक। नवाबी नगरी रहा टोंक शहर सदियों से रेल के इंतजार में है। अब तक कोई ऐसा जनप्रतिनिधि नहीं हुआ जो टोंक को रेल से जोड़ पाता। हालांकि आजादी के बाद से अब तक हर चुनाव में रेल का मुद्दा उठता रहा है। कई सांसद रेल का वादा कर संसद का तो सफर तय कर गए, लेकिन टोंक की आवाम को वो अब तक रेल का सफर नहीं करा पाए।

जानिए क्यों नहीं आ रही टोंक में रेल

  1. जब सीके जाफर शरीफ रेल मंत्री थे, तब टोंक सांसद रहे बनवारी लाल बैरवा रेल की मांग के लिए उनके पास पहुंचे। जाफर शरीफ ने साफ मना कर दिया, हम टोंक को रेल नहीं दे सकते हैं, लेकिन क्यो नहीं आ पा रही है टोंक में रेल, जानिए। 

  2. रेल के नहीं आने के दो कारण बताए गए। पहला कारण उस जगह रेल लाइन बिछाई जाती है जहां से आर्थिक दृष्टि से नुकसान नहीं हो, दूसरे वहां पर बिना किसी आर्थिक दृष्टि के रेल लाइन बिछाई जाती है, जहां से सेना के लिए सामान एवं आवाजाही होती हो। टोंक इन दोनों शर्तों को पूरा नहीं कर रहा है।

  3. यही बात तब भी आई जब टोंक के सांसद रहे श्यामलाल बंशीवाल तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी से मिले। बहरहाल रेल आना असंभव हो गया। केवल सर्वे के नाम पर ही नेता जनता को अपने प्रयास का अहसास कराते रहे। नमोनारायण मीणा जब टोंक-सवाई माधोपुर लोकसभा सीट से सांसद एवं केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री बने तो लोगों को फिर उम्मीद जागी।

  4. उन्होंने रेल बजट में रेल के लिए करीब 873 करोड़ रुपए प्रावधान कराया, लेकिन बात वहां आकर अटक गई, जब प्रावधान के अनुसार रेल लाइन के लिए आने वाले खर्च का आधा एवं भूमि राज्य सरकार को अवाप्त कराकर दिए जाने की शर्त रख दी गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने कार्यकाल के बिल्कुल आखिर में इस शर्त को स्वीकार किया, लेकिन बाद में उनकी सरकार नहीं रही। 

  5. उसके बाद सांसद जौनापुरिया ने रेल लाइन के मामले को उठाया तथा फिर बात वहीं आकर रुक गई। आखिर में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इस मामले को केंद्र का बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया। जबतक राज्य सरकार भूमि अवाप्ति एवं आधी राशि नहीं देगी तब तक टोंक में रेल आना संभव नहीं हो सकेगा। 

  6. 1964 में रेल के लिए हुए प्रयास

    1964 में सुरेली, ईसरदा से टोंक को रेल लाइन से जोड़ने के लिए प्रस्ताव तैयार हुए। पूर्व सांसद श्यामलाल बंशीवाल के समय ईसरदा से सवाई माधोपुर होते हुए टोंक को जोड़े जाने, पूर्व सांसद बनवारीलाल बैरवा के समय जयपुर- सवाई माधोपुर से टोंक को जोड़ने के लिए सर्वे हुआ। 1989-90 के तत्कालीन सांसद गोपाल पचेरवाल के समय चौथ का बरवाड़ा से वनस्थली, निवाई होते हुए जोड़े जाने का सर्वे की योजना तैयार हुई। 

  7. पूर्व सांसद कैलाश मेघवाल के समय कोटा से अजमेर जाने वाली लाइन को टोंक से जोड़ने का प्रस्ताव पर विचार हुआ। पूर्व केंद्रीय मंत्री नमोनारायण मीणा ने काफी सकारात्मक प्रयास किए। इसके तहत 2009-10 में अजमेर-टोंक, सवाई माधोपुर होते हुए तथा उसके बाद अगले वर्ष देवली-टोंक सकतपुरा होते हुए रेल की संभावनाएं तलाशी गई। इसके बाद अजमेर, सवाई माधोपुर वाया टोंक होते हुए रेल लाइन के लिए सर्वे आदि कार्य हुआ। 

  8. लंबे समय से फंसा है ये पेंच:

    उनके बाद सांसद सुखबीर सिंह जौनापुरिया ने भी रेल के कार्य को आगे बढाने की कोशिश तो की, लेकिन वे भी रेल लाइन के कार्य का शिलान्यास अब तक नहीं करा पाए। ये पेच फंस गया कि राज्य सरकार द्वारा आधी राशि एवं भूमि अवाप्त करके देने पर ही रेल का मार्ग प्रशस्त हो सकता है जो राज्य सरकार आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए अस्वीकार कर चुकी है। 

  9. बजट 8 लाख से बढ़कर हुआ 876 करोड़

    रियासत के समय से ही टोंक को रेल से जोड़े जाने के लिए प्रयास चल रहे हैं। रेल लाइन का बजट 8 लाख से बढ़कर 873 करोड़ हो गया है। टोंक को रेल से जोड़े जाने की सुगबुगाहट चौथे नवाब इब्राहिम अली खां के समय से ही शुरू हो गई थी। नवाब सआदत अली खां के समय रेल के लिए एक कमेटी बनाई गई तथा चार लाख रुपए फिरदौस जमानी बैगम ने अपने कोष से दिए।

  10. रियासत कोष से चार लाख रुपए मिलाए गए। आठ लाख में रेल के आने के लिए तैयारियां हुईं। दो डिब्बे भी आ गए, लेकिन बाद में मामला ठंडे बस्ते में ऐसा गया कि आज तक रेल लाइन का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सका। कभी आर्थिक स्थितियों का हवाला देकर रेल लाइन रोकी गई, तो अब राज्य सरकार द्वारा आधी राशि वहन करने एवं भूमि अवाप्ति के पेंच के बीच रेल का मार्ग प्रशस्त नहीं हो पा रहा है।
     

  11. टोंक जिले की आबादी करीब 15 लाख है तथा बेरोजगारी की समस्या यहां पर अधिक है। जिला मुख्यालय पर रेल नहीं होने को बेरोजगारी का मुख्य कारण भी माना जाता रहा है। हालांकि टोंक जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर रेल लाइन है, लेकिन वहां पर भी बेहद कम ट्रेनें रुकती है।

     

    स्टोरी: एम.असलम

Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..