राजस्थान / बांसवाड़ा-प्रतापगढ़ क्षेत्र के बच्चे गडरियों के पास गिरवी, क्योंकि घर में उन्हें खिलाने के लिए कुछ नहीं



चुंडई गांव में 10 से 14 साल का एक भी लड़का नहीं है। चुंडई गांव में 10 से 14 साल का एक भी लड़का नहीं है।
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चुंडई गांव में 10 से 14 साल का एक भी लड़का नहीं है।चुंडई गांव में 10 से 14 साल का एक भी लड़का नहीं है।

  • 8 गांव, 500 से ज्यादा परिवार, डेढ़ से दो हजार रुपए में बच्चे गिरवी रखते हैं
  • 10 से 14 साल का एक भी लड़का चुंडई गांव में नहीं, मारवाड़ से बच्चा खरीदने आते हैं गडरिए

Dainik Bhaskar

Jun 13, 2019, 11:26 AM IST

बांसवाड़ा (चिराग द्विवेदी/दीपेश मेहता). गडरियाें के पास बच्चाें काे गिरवी रखने के एक नहीं पूरे 14 मामले। वे भी वाे जाे चाइल्ड लाइन के रिकॉर्ड में सामने आ पाए हैं। आखिर मां-बाप अपने बच्चाें काे गडरियाें के पास कैसे गिरवी रख सकते हैं? यह काैंदता सवाल हमें उन गांवाें तक ले गया, जहां शायद किसी की मजबूरी न हाे ताे कभी न जाए।

 

जब भास्कर टीम इन गांवों में पहुंची तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए, यहां 500 से ज्यादा ऐसे परिवार हैं, जिन्होंने सिर्फ दो वक्त की रोटी के लिए अपने बच्चों को एक न एक बार गिरवी रखा है। अभी भी करीब 22 बच्चे गिरवी हैं। लेकिन, न तो उनके परिजन उनके नाम बताने को तैयार हैं न ही ग्रामीण। उन्हें डर है कि अगर उनके बच्चे वापस आ गए तो उन्हें एक वक्त का खाना भी नसीब नहीं होगा। क्योंकि बांसवाड़ा-प्रतापगढ़ की सीमा पर सटे इन आदिवासी गांवाें में दूर-दूर तक सिर्फ पथरीले पहाड़ ही नजर आते हैं। बांसवाड़ा के चुंडई, बोरतलाब और मैमखोर, प्रतापगढ़ जिले के भैंठेसला, बावड़ीखेड़ा, कटारों का खेड़ा, लिम्बोदी, अंबाघाटी गांवों में ऐसे ही हालात हैं।

 

 

पिछले दो माह में बांसवाड़ा-प्रतापगढ़ के 8 बच्चे गडरियों के चुंगल से भागे, माता-पिता ने महज डेढ़ से दो हजार रुपए के लिए उन्हें गडरियों के पास गिरवी रख दिया था... घटना के बाद भास्कर के दो रिपोर्टरों ने 7 दिन तक बांसवाड़ा-प्रतापगढ़ जिलों की सीमा पर सटे 8 गांवों में पहुंचकर सच जाना। यहां गरीबी का भयावह चेहरा दिखा। पांच बच्चों के परिवार को तलाशने गए थे, यहां पता चला कि इन गांवों में 500 से ज्यादा परिवार ऐसे हैं, जिन्होंने सिर्फ घर का गुजारा चलाने के लिए अपने बच्चों का बचपन गिरवी रख दिया... 


10 से 14 साल का एक भी लड़का चुंडई गांव में नहीं 


बांसवाड़ा शहर से 59 किलोमीटर दूर खमेरा के पास है चुंडई गांव। यहां के दो लड़कों काे गडरिए को गिरवी रखने का मामला सामने आया है। मुख्य सड़क से 7 किमी अंदर इस गांव में सूखा पड़ा है। पानी के लिए एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ के हैंडपंप पर जाना पड़ता है। गांव के कई परिवाराें के पास अभी तक बिजली नहीं पहुंची है। हम अज्जू के परिवार के पास पहुंचे। गांव से 3 किमी अंदर पहाड़ी के बीच में एक कच्चा मकान। अज्जू महज 12 वर्ष का है। आर्थिक स्थिति सही नहीं थी। अज्जू के अलावा उसके घर में उसकी चार बहनें वहीया, दीपिका, पूजा और साइना है। इन सबका गुजारा चलाने के लिए उनके पास एक मात्र साधन है 2 बीघा खेत, जिसमें सिर्फ बारिश में ही फसल होती है, क्योंकि इसके अलावा वहां पर पानी की कोई व्यवस्था नहीं है।

 

अज्जू के पिता मोहन शराब के आदी हैं। एक दिन घर में खाने काे लेकर अज्जू की मां इंद्रा और मोहन के बीच में झगड़ा हुआ और वह अपने पीहर चली गई। उधर, माेहन गांव के ही एजेंट के पास गया और अज्जू को गिरवी रख दिया। यह बात सिर्फ डेढ़ हजार रुपए प्रतिमाह के लिए हुई। यहीं हमें दिनेश मिला। दाे साल तक गडरिए के पास काम करके वह पिछले माह ही भागकर लाैटा है। उसकी भी उम्र महज 12 साल है। उसके पिता लाला ने उसे 2 हजार रुपए के लिए गिरवी रख दिया। इसमें मां लीला की भी सहमति थी। घर में खाने काे कुछ था नहीं।

 

पिता लाला ने लीला से कहा कि दिनेश काे भेज देते हैं। दाे हजार में उनके परिवार काे कुछ दिन गुजारा चलेगा और दिनेश काे ताे राेटी गडरिए से मिल जाएगी। मजबूरी में मां ने भी हामी भर ली। इसी गांव के हम उम्र कालू ने एक साल तक गडरिये पास रहकर काम किया। लेकिन गडरिये ने पैसे नहीं दिए। कालू के पिता शंभु पिछले पांच सालों से खाड़ी देश में मजदूरी कर रहे हैं।


मारवाड़ से बच्चे खरीदने आते हैं गडरिए


पाली, सिराेही, जैसलमेर, जाेधपुर आदि क्षेत्राें से गडरिये आते हैं। इनके पास करीब 1200 से 1500 भेड़े, ऊंट, कुत्ता, टेंट, पलंग, अपनी रसाेई का सामान आदि सभी साधन हाेते हैं। इसमें हर एक झुंड अपने बीच में दूरी बनाए रखता है। ये लाेग गर्मियाें में रास्ते में आने वाले बांसवाड़ा-प्रतापगढ़ के ऐसे गांवाें के लाेगाें से संपर्क करते हैं, जाे ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हाें। जहां पर मूलभूत सुविधाएं नहीं हाें। अभाव भरी जिंदगी से तंग आकर वाे इनके झांसे में आ जाते हैं और उनके साथ चले जाते हैं। एक बार वह निकल ताे जाते हैं, लेकिन उन्हें वापस आने का रास्ता पता नहीं हाेता है। गडरिये सिर्फ 8 से 14 साल के बच्चों को ही अपने साथ ले जाते हैं, क्योंकि कम उम्र के बच्चे डरते हैं, खाना कम खाते हैं और काम ज्यादा करते हैं। वे इन्हें दो से तीन साल तक ही अपने साथ रखते हैं। बांसवाड़ा या प्रतापगढ़ जिले के अंदरुनी गांव में इनके एजेंट निर्धारित रहते हैं। यह यहां से बच्चे गिरवी ले जाने के लिए सिर्फ उनसे ही बात करते हैं। 

 

गांव में पनपे बच्ची की खरीद-फरोख्त कराने वाले दलाल


हम चुंडई गांव में गिरवी रखे बच्चे अज्जू के घर पहुंचे तो वहां आसपास घरों से भी लोग जमा हो गए। ग्रामीणाें ने बताया कि गांव में चौखलाल नाम का एक एजेंट है जो गडरिए के संपर्क में रहकर सीधे परिजनों से साैदेबाजी कराता है। अज्जू को भी उसके पिता चौखलाल के बताए गड़रिए के पास ही छोड़ आए थे। हम चाैखलाल के पास पहुंचे तो एक बार तो वह सहम गया। शुरुआत में तो बच्चों को गड़रिए के पास छोड़ने की बात पूछने पर वह इनकार करता रहा लेकिन बाद में जब एक के बाद एक उसके द्वारा भेजे गए बच्चों के नाम लिए तो बाद में कबूल किया कि जब घर वाले कोई भेजना चाहते हैं और गडरिए को किसी काम के लिए बच्चों की जरूरत होती है तो वह बताता है।

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