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टिटहरी का अंडा फूट गया तो छह साल की बच्ची को पंचायत ने जाति से निकाल बाहर किया

10 दिनों तक घर के बाहर तेज गर्मी में टिनशेड के नीचे अकेली अछूत की तरह रही

Danik Bhaskar | Jul 12, 2018, 03:17 PM IST
10 दिनों तक बच्ची को इसी तरह ऊपर 10 दिनों तक बच्ची को इसी तरह ऊपर

बूंदी (राजस्थान). फूल सी मासूम छह साल की खुशबू दो जुलाई को पहली बार स्कूल गई थी। उसी दिन स्कूलों में बच्चाें को दूध पिलाने की योजना शुरू हुई थी। दूध के लिए बच्ची लाइन में लगी तो टिटहरी के घोंसले पर पैर चला गया। एक अंडा क्या फूट गया...बवंडर आ गया। बूंदी के हरिपुरा गांव में पंचायत बैठी। बच्ची को जीव हत्या का दोषी मानते हुए जाति से बाहर निकालने का फरमान सुना दिया गया।

घर के बाहर बच्ची रोती रही... मां भी उसे हाथ नहीं लगा सकी: घर के बाहर टिनशेड में बच्ची ने तेज़ गर्मी में पूरे दस दिन बिताए। बच्ची रोती...तो भी मां मीना उसे हाथ नहीं लगा सकती थी। ख़बर बुधवार को कलेक्टर-एसपी के पास पहुंची तो पंचों पर दबाव बनाकर बच्ची की घर वापसी कराई। राज्य मानवाधिकार आयोग ने बूंदी-कलेक्टर एसपी से अब इस संबंध में रिपोर्ट मांगी है।

पंचों का जुर्माना...गाय के लिए चारा, खुद के लिए शराब: बच्ची को जाति से तो निकाला ही, पंचों ने बच्ची के पिता हुकमचंद पर जुर्माना भी लगा दिया। कहा गया : गायों को चारा, मछलियों को आटा, कबूतरों को ज्वार डाले...और एक किलो भूंगड़े (सिके हुए चने), एक किलो नमकीन और अंग्रेजी शराब की बोतल पंचायत को दी जाए। तीन दिन बाद पंचायत फिर बैठी, पर बात इस पर अड़ गई कि हुकमचंद एक पंच से कुछ साल पहले उधार लिए डेढ़ हजार रुपए तत्काल चुकाए।

गांववाले अपने स्तर से निपट लेते: 10 दिन बच्ची ऐसी सजा भुगतती रही, गांववालों को अपने स्तर पर इससे निबट लेना चाहिए था। पता चलते ही तहसीलदार, थानेदार को तुरंत कार्रवाई के आदेश दे दिए गए। - महेशचंद्र शर्मा, कलेक्टर

भास्कर विचार. एक मासूम अपराध के बदले इतना बड़ा पाप

रोते हुए बच्चों को हंसाना...ईश्वर की पूजा के समान माना गया है। पंच भी ईश्वर का ही रूप कहे गए हैं। लेकिन ईश्वर बच्चों को नहीं रुलाते। ये कैसे पंच हैं, जो एक मासूम बच्ची के खिलाफ खड़े हो गए। अपनी पूरी ताकत..एक बच्ची को रुलाने में लगा दी! दस दिनों तक उस मासूम ने जो पीड़ा भोगी-देखी, निश्चित तौर पर उसके दोषी तय होने चाहिए। ऐसी मिसाल बननी चाहिए कि जातीय पंचायतें कोई भी फैसला सुनाने से पहले सौ बार सोचें...क्योंकि वे समाज के भरोसे पर ही टिकी हुई हैं।