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जयपुर बम ब्लास्ट / जज ने फैसले में कहा- आईएम के इशारे पर राष्ट्र के खिलाफ सुनियोजित षड़यंत्र के तहत किया अपराध

The distinguished judge said in the verdict - This is a crime committed under a planned conspiracy against the nation on the basis of IM
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The distinguished judge said in the verdict - This is a crime committed under a planned conspiracy against the nation on the basis of IM

  • 13 मई 2008 को हुए छह जगहों पर आठ ब्लास्ट में गई थी 71 लोगों की मौत 
  • 11 साल बाद विशिष्ट कोर्ट के न्यायाधीश अजय कुमार शर्मा ने सुनाया फैसला

विष्णु शर्मा

विष्णु शर्मा

Dec 20, 2019, 10:00 PM IST

जयपुर. शहर के परकोटा इलाके में 6 जगहों पर 13 मई 2008 की शाम को हुए 8 सीरियल बम ब्लास्ट के मामले में स्पेशल कोर्ट ने दोषी माने गए चारों आतंकियों को शुक्रवार को फांसी की सजा सुनाई। मामले में जयपुर बम धमाकों की सुनवाई के लिए बनाई गई विशेष कोर्ट के विशिष्ट न्यायाधीश अजय कुमार शर्मा (प्रथम) ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि अभियुक्त द्वारा किया गया अपराध राष्ट्र के खिलाफ एक सुनियोजित षड़यंत्र के तहत किया गया था। यह एक आतंकवादी कृत्य था, जो इंडियन मुजाहिदीन के इशारे पर किया गया था।

समाज में आतंक फैलाकर श्रृंखलाबद्ध बम ब्लास्ट कर हत्याएं की

स्पेशल जज अजय कुमार शर्मा ने लिखा कि अभियुक्तों ने योजना बनाकर समाज में आतंक फैलाकर श्रृंखलाबद्ध बम ब्लास्ट कर हत्याएं की व लोगों को आहत किया। बिना किसी हेतु के यह क्रूर अपराध किया गया। अपराध करने का तरीका जो अपनाया गया, उसमें घातक विस्फोट से टाइम बम तैयार किए गए और उनको धार्मिंक स्थलों व भीड़भाड़ वाले इलाकों में साइकिलों में रखकर प्लांट किया गया, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों की हत्याएं की जा सके। इस घटना में मारी गई महिलाओं व आहतों की अभियुक्तों से कोई दुश्मनी नहीं थी।

राष्ट्रद्रोह का षड़यंत्र रचना विरलतम से विरलतम मामला है, ऐसे में कोर्ट की कोई सहानुभूति नहीं

जज ने अपने फैसले में कहा कि न्यायालय को सिर्फ अभियुक्त के अधिकारों के बारे में नहीं बल्कि घटना में आहत हुए व मृत हुए व्यक्तियों के परिवारों के बारे में भी देखना है। मेरी राय में बिना किसी कारण के निर्दोष लोगों की हत्या करना व सुनियोजित ढंग से राष्ट्र द्रोह का षड़यंत्र रचना एक विरलतम से विरलतम मामला है। जिसमें न्यायालय की कोई सहानुभूति अभियुक्त से नहीं की जा सकती है।

अभियुक्तों के जिंदा रहने से समाज को खतरा है

अभियुक्तों द्वारा किया गया कृत्य अत्यंत क्रूर, वीभत्स और दिल को दहलाने वाला है। जिसके लिए उपर्युक्त दंड, मृत्युदंड के अलावा कुछ और नहीं हो सकता है। ऐसे आतंक फैलाकर लोगों की हत्या करने वाले अभियुक्तों के जिंदा रहने से समाज को खतरा है। इसी इंडियन मुजाहिदीन गिरोह पर जयपुर की घटना के बाद अहमदाबाद और अन्य जगह ब्लास्ट किए गए।

कोर्ट ने कहा कि मोहम्मद सैफ ने 13 मई को माणकचौक थाने के सामने बम प्लांट किया था। इसी तरह अन्य अभियुक्तों ने अन्य तीन जगह बम रखे। उपरोक्त परिस्थितियां ऐसी है, जो अभियुक्त द्वारा बताई गई शमनीय परिस्थितियों के मुकाबले ज्यादा गंभीर है। सिर्फ अभियुक्त के विद्यार्थी होने एवं संपन्न व संभ्रांत परिवारों से होने और लंबे समय से जेल में रहने की जो परिस्थितियां बताई गई है। उनसे ऐसी कोई सहानुभूति अभियुक्त को न्यायालय से नहीं मिलती।

ऐसा कोई तर्क या आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है कि सजा कम की जा सके

जज अजय शर्मा ने कहा कि अभियुक्त द्वारा ऐसा कोई तर्क या आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है कि धारा 302 आईपीसी और धारा 16(1) ए विधि विरूद्ध क्रिया कलाप निवारण अधिनियम के आरोप में सजा कम की जा सके। यह अपराध विरलतम से विरलतम अपराध की श्रेणी में आता है। मामले में विशिष्ट कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा महेश बनाम स्टेट ऑफ एमपी ए.आई.आर. 1987 एससी 1346 और धनंजय चटर्जी उर्फ धन्ना बनाम स्टेट ऑफ वेस्ट बंगला 1994(2) एससी केसेज 626 में प्रतिपादित सिद्धांतों का रेफरेंस भी दिया।

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