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सोशल साइंस के महारथी ‘फजी’ व कंप्यूटर साइंस वाले होते हैं ‘टेकी’

सिटी रिपोर्टर

Danik Bhaskar | Sep 11, 2018, 04:15 AM IST
सिटी रिपोर्टर
वेस्टर्न सोसाइटी की बौद्धिकता को ‘विज्ञान’ एवं ‘मानविकी’ दो संस्कृतियों में विभाजित कर दिया गया है और दुनिया की समस्याओं को हल करने में यही सबसे बड़ा अवरोध है। आज ऐसे भी कई लोग हैं, जो ह्यूमैनिटीज बैकग्राउंड से होने के बावजूद अत्यंत सफल एवं प्रभावी एप्स एवं पोर्टल बनाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मानवीय मानसिकता किस प्रकार से तकनीक के साथ-साथ चलती है। यह कहना था ‘द फजी एंड द टेकी’ बुक के राइटर स्कॉट हार्टले का। वे जंतर-मंतर में इस बुक के बारे में आयोजित चर्चा में सं‍बोधित कर रहे थे।

स्कॉट ने कहा कि टीम मैसेजिंग के एप ‘स्लैक’ के डायरेक्टर स्टीवर्ट बटरफील्ड के पास फिलॉस्फी की दो डिग्रियां थीं और ई-कॉमर्स समूह ‘अलीबाबा’ के डायरेक्टर जैक मा ने इंग्लिश लिटरेचर में डिग्रियां ले रखी थीं। इस प्रकार, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा रहा है कि ऐसे लोग जो तकनीकी विशेषज्ञ नहीं - सर्वाधिक रचनात्मक एवं सफल नए व्यावसायिक विचारों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। अपनी बुक के बारे में जानकारी देते हुए हार्टले ने कहा कि उन्होंने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान का अध्ययन करते समय पहली बार ‘फजी’ और ‘टेकी’ शब्द सुने। यदि किसी ने ह्यूमेनिटी अथवा सोशल साइंस में विशेषज्ञता हासिल की थी, तो वह ‘फजी’ कहलाता था और इसी प्रकार यदि किसी ने कंप्यूटर साइंस में महारत हासिल की है तो उसे ‘टेकी’ कहा जाता था।