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जैसलमेर की राजनीति में फकीर परिवार का रहा वर्चस्व / जैसलमेर की राजनीति में फकीर परिवार का रहा वर्चस्व

Bhaskar News Network

Jan 02, 2016, 02:20 AM IST

Jaisalmaer News - जैसलमेरमें कांग्रेस की राजनीति की धूरी अगर किसी को कहा जाए तो वह गाजी फकीर परिवार ही है। केवल यहीं के कांग्रेसी...

जैसलमेर की राजनीति में फकीर परिवार का रहा वर्चस्व
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जैसलमेरमें कांग्रेस की राजनीति की धूरी अगर किसी को कहा जाए तो वह गाजी फकीर परिवार ही है। केवल यहीं के कांग्रेसी नेता नहीं बल्कि प्रदेश संगठन भी इसे भली भांति मानता है। ऐसे में फकीर परिवार ने कइयों को विधायक तक बना दिया तो कइयों का राजनैतिक जीवन हाशिए पर डाल दिया। हाल में जैसलमेर कांग्रेस में एक बार फिर फकीर परिवार से टकराव की स्थिति देखने को मिल रही है। हाल ही में राजनीति में आए धणदै परिवार का टकराव फकीर परिवार से हो गया है और सार्वजनिक तौर पर दोनों आमने सामने दिखाई देने लगे हैं।

इन्होंने तो भाजपा ज्वाॅइन कर ली

कांग्रेसके दो दिग्गज ऐसे हैं जो फकीर परिवार के साथ नहीं रहे और सामने खड़े रहे। नतीजा यह हुआ कि उन्हें कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामना पड़ा। जिसमें रणवीर गोदारा जनकसिंह शामिल हैं। दोनों ने ही मजबूर होकर कांग्रेस छोड़ी और भाजपा में जुड़ गए।

जिसने दिलाई राजनीति में पहचान, उसे धूल चटा दी

जैसलमेरकी राजनीति में फकीर परिवार की शुरूआत 1975 से हुई थी। पूर्व विधायक भोपालसिंह ने गाजी फकीर को राजनीति में पहचान दिलाई थी। लेकिन बाद में 1985 में फकीर ने भोपालसिंह को चुनावों में हरा दिया। इन चुनावों में फकीर ने मुस्लिम मेघवाल गठबंधन बनाया और मुल्तानाराम बारूपाल को जितवा दिया। उसके बाद से भोपालसिंह का राजनीति कैरियर धीरे धीरे खत्म होना शुरू हो गया और वे दोबारा राजनीति में आगे नहीं बढ़ पाए।

राज परिवार का हमेशा साथ दिया

फकीरपरिवार की यह खासियत रही कि उन्होंने राज परिवार का हमेशा साथ दिया। राज परिवार के सदस्यों के साथ फकीर ने कभी दगा नहीं किया। हुकमसिंह, रघुनाथसिंह, चंद्रवीरसिंह से लेकर रेणुका भाटी का फकीर परिवार ने साथ दिया है। केवल जितेन्द्रसिंह अपवाद रहे क्योंकि वे कांग्रेस से टिकट लेकर आए थे और फकीर परिवार ने अपना सदस्य निर्दलीय खड़ा कर दिया जिससे दोनों की हार हो गई।

एक बार फिर रूपाराम से टकराव की स्थिति

फकीरपरिवार ने गत चुनावों में सुनीता भाटी का साथ नहीं दिया और रूपाराम का साथ दिया। रूपाराम को टिकट मिल गई लेकिन फकीर उन्हें जितवा नहीं पाए। बाद में पूरी ताकत लगाकर रूपाराम परिवार को जिला प्रमुख की सीट दिला दी। लेकिन अब इनमें टकराव की स्थिति है। चर्चा यह है कि अब रूपाराम का राजनीतिक कैरियर दांव पर है। दोनों परिवारों में गुटबाजी चौड़े चुकी है। 1985 में बना मुस्लिम मेघवाल गठबंधन 2015 में लगभग टूट चुका है। आगामी चुनावों में यह गठबंधन शायद ही नजर आए।

कांग्रेस में कई नेताओं ने फकीर परिवार से मुकाबला किया। जो पहले इनके खास रहे और बाद में टकराव की स्थिति बन गई। मुकाबला हुआ और आखिरकार जीत फकीर परिवार की हुई। इसका लम्बा चौड़ा इतिहास है। 1998 के बाद गोवर्धन कल्ला फकीर परिवार से दूर हुए और 2003 में फकीर ने उनकी टिकट कटवा दी। सुनीता भाटी फकीर शुरू से आमने सामने रहे हैं जिसका नतीजा है कि सुनीता भाटी आज तक अपना कैरियर नहीं बना सकी है। एक बार विधायक की टिकट भी मिली लेकिन हार झेलनी पड़ी। इसके अलावा मुल्तानाराम बारूपाल, रामजीराम, अब्दुल रहमान जैसे कई नेताओं को फकीर परिवार ने हाशिए पर लाकर खड़ा कर दिया।

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