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गर्ल्स कॉलेज में एबीवीपी ने पैनल ही नहीं उतारा

जालोर जिले की चार राजकीय कॉलेजों में से दो के अध्यक्ष पर एबीवीपी ने कब्जा जमाया है जबकि एक में एनएसयूआई तो एक में...

Danik Bhaskar

Sep 12, 2018, 04:35 AM IST
जालोर जिले की चार राजकीय कॉलेजों में से दो के अध्यक्ष पर एबीवीपी ने कब्जा जमाया है जबकि एक में एनएसयूआई तो एक में निर्दलीय प्रत्याशी ने जीत दर्ज की है। जिले के सबसे बड़े कॉलेज वीर वीरमदेव राजकीय पीजी कॉलेज जालोर में एनएसयूआई के दीपक कुमार थांवला ने एबीवीपी के नाथूसिंह को 175 मतों से हराया। जालोर गर्ल्स कॉलेज में निर्दलीय दीपिका शर्मा ने एनएसयूआई की निराली गौड़ को 102 मतों से पराजित किया। गर्ल्स कॉलेज में तो एबीवीपी ने पैनल ही नहीं उतारा था। इधर, आहोर कॉलेज में एबीवीपी के श्रवणकुमार माली ने निर्दलीय गोविंद कुमार मेघवाल को 4 मतों से हराया। भीनमाल कॉलेज में एबीवीपी की जीनल त्रिवेदी ने एनएसयूआई के प्रकाश बिश्नोई को 110 मतों से पराजित किया। हालांकि, जालोर गर्ल्स कॉलेज में एबीवीपी ने पैनल नहीं उतारा था। जालोर पीजी कॉलेज में एबीवीपी की भीतरघात के चलते एनएसयूआई ने परचम फहराया।

भूख हड़ताल से विद्यार्थियों में बनी दीपक की पेठ, एनएसयूआई ने भी बनाया प्रत्याशी

दो महीने पहले पीजी कॉलेज में व्याख्याताओं की कमी, छात्रावास शुरू करवाने और एक प्रोफेसर का स्थानांतरण निरस्त कराने को लेकर धीरज गुर्जर के साथ दीपक कुमार थांवला ने भी भूख हड़ताल की थी। प्रोफेसर का स्थानांतरण निरस्त हुआ और छात्रावास की प्रक्रिया भी शुरू हुई गई। इससे विद्यार्थियों में दीपक की पेठ बनी और इसको भुनाने के लिए एनएसयूआई ने भी दीपक को ही अपना प्रत्याशी बनाया।

भूख हड़ताल से बनी पेठ और एबीवीपी के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्षों के वर्चस्व की लड़ाई ने दीपक को बनाया पीजी कॉलेज अध्यक्ष

जालोर पीजी कॉलेज

मतदाता

2756

अध्यक्ष पद

दीपक कुमार

(एनएसयूआई)

नाथूसिंह

(एबीवीपी)

अवैध मत - 28

उपाध्यक्ष पद

कानाराम चौधरी

(निर्दलीय)

मोतीलाल

(निर्दलीय)

मोतीलाल

(निर्दलीय)

मनोज मोतियानी

(एनएसयूआई)

निरमा

(निर्दलीय)

मतदान

1789

968

793

जीत का अंतर 175

627

403

403

364

350

भीनमाल व आहोर में एबीवीपी तो जालोर गर्ल्स कॉलेज में निर्दलीय दीपिका ने मारी बाजी

पूर्व छात्रसंघ अध्यक्षों के वर्चस्व की लड़ाई ले डूबी एबीवीपी को

जालोर पीजी कॉलेज में वर्ष 2014 से लेकर 2017 तक हुए चार चुनावों में केवल 2016 में एनएसयूआई ही जीत पाई थी। 2014 में मुकेश राजपुरोहित जीता। जिसने 2015 में मानसिंह मंडलावत को खड़ा करके जिताया। दोनों पूर्व अध्यक्षों की जोड़ी बनी और 2016 में जो प्रत्याशी खड़ा किया वह एनएसयूआई से हार गया। लेकिन दोनों की रणनीति के चलते 2017 में हीनल व्यास जीता। हीनल दोनों पूर्व अध्यक्षों का हस्तक्षेप सहन नहीं कर पाया और उसने अपने वर्चस्व को लेकर लड़ाई शुरू कर दी। इस बार हीनल की चली और वह एबीवीपी से नाथूसिंह को टिकट दिलाने में कामयाब रहा। इसके विरोध में मानसिंह मंडलावत और मुकेश ने नगर संयोजक के माध्यम से विक्रमसिंह नरावत को खड़ा करने की कोशिश की लेकिन अंतिम समय में उसने फार्म नहीं भरा। जानकारों की माने तो नाथूसिंह को लेकर भीतरघात की शुरुआत वहीं से हो गई थी जिसका खामियाजा एबीवीपी की हार के रूप में सामने आया।

वर्चस्व की लड़ाई के चलते पैनल भी नहीं उतार पाए

बीते वर्ष जिस प्रकार की स्थिति एनएसयूआई की थी, वैसी स्थिति इस बार जिला मुख्यालय पर एबीवीपी की रही। पूर्व छात्रसंघ अध्यक्षों के वर्चस्व की लड़ाई के कारण संगठन की ओर से पूरा पैनल ही नहीं उतारा गया। जहां पीजी कॉलेज में केवल अध्यक्ष व महासचिव पद पर प्रत्याशी खड़े किए गए। वहीं महिला कॉलेज में तो पैनल से एबीवीपी ने एक भी प्रत्याशी को खड़ा नहीं किया। फिर भी पीजी कॉलेज में एबीवीपी को महासचिव पद पर जीत हासिल हुई और गर्ल्स कॉलेज में निर्दलीय जीते।

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