धानोल में शराबबंदी, फिर भी सबसे ज्यादा खपत वाला ठेका, क्याेकि यहां कि शराब गुजरात में होती है सप्लाई

Jalore News - लॉटरी में जिनके नाम खुले ठेके वे भी लेने को नहीं तैयार, कारण यहां शराब पीने वाले बुहत कम, तस्करी के जरिए गुजरात...

Bhaskar News Network

Mar 17, 2019, 03:06 AM IST
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लॉटरी में जिनके नाम खुले ठेके वे भी लेने को नहीं तैयार, कारण यहां शराब पीने वाले बुहत कम, तस्करी के जरिए गुजरात पहुंचती है शराब

भास्कर न्यूज | जालोर

वर्षों पूर्व देश में गुजरात राज्य ने पूर्ण रूप से शराबबंदी कर देश में अन्य प्रदेशवासियों के लिए एक नजीर पेश की थी। देशभर में यह फैसला सराहा गया और इससे प्रेरित बिहार जैसे अन्य राज्यों ने भी शराबबंदी जैसे कदम उठाए, लेकिन वहां के प्रदेशवासियों ने शराब से दूरी बना ली हो या फिर गुजरात में शराब नहीं बिकती हो, यह हकीकत से आज भी परे हैं।

गुजरातवासियों के शराब की शौकिनाई के कारण ही बॉर्डर पर स्थित राजस्थान प्रदेश के चार गांव आज बदनाम हो चुके हैं। सबसे कम आबादी वाले इन चार गांवों में गुजरात में शराबबंदी के बाद जिला मुख्यालयों से भी अधिक मात्रा में शराब की बिक्री होती है। रिकॉर्ड के मुताबिक इन गांवों में ही इतनी बड़ी मात्रा में शराब बिक रही है, लेकिन सत्यता तो यह है कि सीमा पर होने के कारण इन्हीं ठेकों से शराब की अवैध सप्लाई सीधे तौर से गुजरात में की जाती है। इस कारण शराब का अधिक उठाव होने के कारण अब इनकी कंपोजिट फीस प्रदेश के अन्य बड़े शहरों से भी अधिक है। हालात यह हो चुके हैं कि यहां लॉटरी में जिसका नाम आता है, सामान्य प्रकार का व्यक्ति तो इसे संचालित ही नहीं कर पाता है। इस बार भी कुछ ऐसे ही हालात बने हुए हैं। जालोर जिले की बडग़ांव-धानोल कंपोजिट शराब समूह जिसके नाम आवंटित हुआ है, वह पार्टी तो आधी फीस भरने के लिए भी तैयार नहीं हो पा रही है। जिस कारण अब आबकारी विभाग को भी मान मन्नोव्वल करनी पड़ रही है।

लॉटरी में जिनके नाम खुले ठेके वे भी लेने को नहीं तैयार, कारण यहां शराब पीने वाले बुहत कम, तस्करी के जरिए गुजरात पहुंचती है शराब

भास्कर न्यूज | जालोर

वर्षों पूर्व देश में गुजरात राज्य ने पूर्ण रूप से शराबबंदी कर देश में अन्य प्रदेशवासियों के लिए एक नजीर पेश की थी। देशभर में यह फैसला सराहा गया और इससे प्रेरित बिहार जैसे अन्य राज्यों ने भी शराबबंदी जैसे कदम उठाए, लेकिन वहां के प्रदेशवासियों ने शराब से दूरी बना ली हो या फिर गुजरात में शराब नहीं बिकती हो, यह हकीकत से आज भी परे हैं।

गुजरातवासियों के शराब की शौकिनाई के कारण ही बॉर्डर पर स्थित राजस्थान प्रदेश के चार गांव आज बदनाम हो चुके हैं। सबसे कम आबादी वाले इन चार गांवों में गुजरात में शराबबंदी के बाद जिला मुख्यालयों से भी अधिक मात्रा में शराब की बिक्री होती है। रिकॉर्ड के मुताबिक इन गांवों में ही इतनी बड़ी मात्रा में शराब बिक रही है, लेकिन सत्यता तो यह है कि सीमा पर होने के कारण इन्हीं ठेकों से शराब की अवैध सप्लाई सीधे तौर से गुजरात में की जाती है। इस कारण शराब का अधिक उठाव होने के कारण अब इनकी कंपोजिट फीस प्रदेश के अन्य बड़े शहरों से भी अधिक है। हालात यह हो चुके हैं कि यहां लॉटरी में जिसका नाम आता है, सामान्य प्रकार का व्यक्ति तो इसे संचालित ही नहीं कर पाता है। इस बार भी कुछ ऐसे ही हालात बने हुए हैं। जालोर जिले की बडग़ांव-धानोल कंपोजिट शराब समूह जिसके नाम आवंटित हुआ है, वह पार्टी तो आधी फीस भरने के लिए भी तैयार नहीं हो पा रही है। जिस कारण अब आबकारी विभाग को भी मान मन्नोव्वल करनी पड़ रही है।

बहुत कम आबादी वाले ये गांव जिले के सबसे बड़े शहरों से भी पांच गुणा से अधिक की कंपोजिट फीस के मालिक

जिला मुख्यालय से सात गुणा महंगे हैं बॉर्डर के गांव के ठेके

जालोर के बडग़ांव व धानोल तथा सिरोही जिले के मावल व जाबूंड़ी में शराब की दुकानों की कंपोजिट फीस जिला मुख्यालयों से करीब सात गुणा अधिक है। जबकि आबादी के लिहाज से देखा जाए तो इन गांवों की आबादी शहरों के मुकाबले दस गुणा कम है, इन सभी गंावों में प्रत्येक की आबादी पांच हजार से भी कम है, लेकिन गुजरात में शराबबंदी होने के कारण यहां की दुकानों की शराब की खपत गुजरात में हो रही है। यही कारण इन ठेकों की कीमत बढक़र सबसे महंगी हो गई है।

जालोर. गुजरात सीमा पर बसा धानोल गांव।

1 करोड़ 30 लाख रुपए का है धानोल का ठेका

जालोर जिले में गुजरात सीमा पर स्थित धानोल-बडग़ांव शराब दुकान की कंपोजिट फीस 1 करोड़ 30 लाख रुपए है। इस वर्ष जिस समूह के लिए आवंटन हुआ है, वह फीस चुकाने में भी असमर्थ है। जिस कारण विभाग ने इन दोनों गांवों के साथ मालवाड़ा को भी जोड़ दिया है। इन तीन गांवों में से दो स्थानों पर लोकेशन दी गई है। यही हालात सिरोही जिले के आबूरोड तहसील के जांबूड़ी और मावल कंपोजिट ठेकों के है।

ये हैं प्रमुख कारण

जिले की सीमाओं पर स्थित शराब के ठेकों से स्थानीय गांव में तो मामूली शराब की खपत होती है, लेकिन पड़ोसी राज्य में शराबबंदी होने के कारण पूरी शराब की सप्लाई गुजरात में कर दी जाती है। इस कारण उस स्थान की शराब की खपत बढऩे के कारण आबकारी विभाग की ओर से लॅाटरी आवंटन के समय कंपोजिट फीस भी खपत के आधार पर तय कर दी जाती है। यही वजह है कि धानोल जिले का सबसे अधिक कीमत वाला ठेका बना हुआ है। जबकि उसी गंाव में शराब का सेवन करने वाले लोगों की संख्या तो मामूली सी ही है।

ये हैं दोनों जिलों की प्रमुख दुकानों के हाल






समाज में पूर्ण शराबबंदी है, फिर भी ज्यादा बिक्री


हम प्रयास कर रहे हैं आवंटन का


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