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बाबैया ढोल की आवाज सुनते ही थिरकते हैं कदम
होली के दूसरे दिन देशभर में धुलंडी पर्व मनाया जाएगा, वही शहर में ऐतिहासिक घोटा गैर खेली जाएगी। शहर के बड़े चौहटे पर वर्षों से चली आ रही घोटा गैर खेलने की परंपरा है। इसकी खासियत यह है कि बाबैया ढोल जैसे ही बजने लगता है तो युवाओं के कदम गैर में खेलने के लिए थिरकने लगते हैं। होली के दूसरे दिन युवाओं को बाबैया ढोल का इंतजार रहता है, जैसे ही ढोल गैर में पहुंचता है तो लोग उत्साह, जोश से नृत्य करने लगते हैं। मंगलवार को घोटा गैर नीलकंठ महादेव मंदिर, खारी रोड, देतरियों का चौहटा एवं मुख्य आयोजन बड़े चौहटे पर होगा। गैर के दौरान भारी संख्या में पुलिस बल तैनात रहेगा। घोटा गैर में सिर्फ एक जाति विशेष के लोग नहीं, बल्कि 36 कौम के लोग उत्साह से भाग लेते हैं।
आज भी कायम है वर्षों पुरानी परंपरा
पुराने समय से चली आ रही परंपरा के अनुसार आज भी घौटा गैर सर्वप्रथम चण्डीनाथ महादेव मंदिर से प्रारंभ होकर सात निंबड़ी, खारी रोड, देतरियों का चौहटा, गणेश चौक होते हुए बड़ा चौहटा पहुंचती है। वर्षों पूर्व भी यही क्रम चलता था। इससे पूर्व दिनभर विभिन्न जातियों, मौजिज, गणमान्य लोगों के यहा ढोल ले जाकर करबा पीने की रस्म निभाई जाती है। चंडीनाथ महादेव मंदिर से जैसे ही ढोल निकलता है तो खारी रोड पर भारी संख्या में लोगो की भीड़ जुट जाती है।
मीर समाज के लोग 60 साल से बजा रहे बाबैया ढोल
स्थानीय जाकोब तालाब के पास रहने वाले मुराद खां मीर बताते हैं कि आथमणा वास में निवास करने वाले मीर समाज के लोग इस ढोल को पिछले 60 वर्षों से बजाते आ रहे हैं। मान्यताओं के अनुसार सैकड़ों वर्ष पुराने इस ढोल को वर्षों पूर्व ठाकुरों द्वारा मीर समाज को सौंपा था। इस ढोल को सिर्फ होली पर्व पर ही बाहर निकाला जाता है। बाकी के दिनों में इस ढोल को बाहर नहीं निकाला जाता है। ढोल बजाने वाले 75 वर्षीय मुफतखां मीर ने बताते हैं कि घोटा गैर में बाबैया जैसे ढोल को लेकर गैर प्रारंभ से पूर्व तेजी से चलना पड़ता है।
घोटा गेर के लिए बाबैया ढोल को तैयार करते हुए मुफतखां।