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झालरापाटन में रावण की तरह जलती है होलिका...ताकि बुराई का अंत हो, डग में धधकते अंगारों से निकलते हैं लोग

एक वर्ष पहले
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जिले में हाेली मनाने के तरीके कई जगह अलग-अलग हैं। झालरापाटन में होलिका के पुतले का दहन किया जाता है तो भालता में लोग एकजुट होकर गमगीन परिवारों के साथ होली मनाते हैं। यहां भाईचारे की मिसाल देखी जा सकती है। इसी तरह रायपुर में भी होली का हुड़दंग अलग ही दिखाई देता है। जिले में होने वाली होली के विभिन्न रूपों को पढ़िए केवल भास्कर में।

झालरापाटन में होलिका दहन अलग ही तरीके से किया जाता है। यहां सालों से होलिका के पुतला दहन की परंपरा चली आ रही है। यहां होली का डांडा गाड़कर लकड़ियों में आग लगाने की बजाय होलिका के पुतले का दहन किया जाता है। पुतले को होलिका की मूरत के रूप में तैयार किया जाता है। महाराज राजेंद्र सिंह सुधाकर के समय 1931 ई. से यहां पुतला जलाने की परंपरा शुरू हुई थी। उस समय एक ही स्थान पर पुतला जलाया जाता था, लेकिन अब झालरापाटन के मुख्य 8 बाजारों में यह पुतला दहन होता है। यहां चौपड़िया बाजार, पीपली बाजार, सेठों का चौराहा, बड़ा मंदिर क्षेत्र सहित अन्य स्थानों पर लोग और व्यापारी आपस में पैसा एकत्रित कर अपने-अपने बाजार का पुतला बनवाते हैं। होली के दिन इन पुतलों का बाकायदा दहन होता है। होलिका का पुतला विशेष रूप से सजाया जाता है। उसका मुखौटा भी बनता है। इसके बाद जब बाजार में इसको रखा जाता है तो तय समय पर इसका दहन होता है।

डग : इनकी श्रद्धा के आगे सभी नतमस्तक

डग. डग में सालों से धधकते अंगारों पर चलने की परम्परा आज भी कायम है। वर्तमान अखाड़ा प्रमुख और हनुमान मंदिर पुजारी प्रभुलाल शर्मा ने बताया कि यह परंपरा उनके दादा पंडित रतनलाल के जमाने से चली आ रही है। पिता गोरधनलाल ने भी इस परंपरा को जारी रखा। चूल की परम्परा जो आज तक इस मन्दिर पर धूलेंडी के दिन शाम को धर्मप्रेमियों के सहयोग से आयोजित की जाती है। इसके अंतर्गत 10 फीट लंबी, डेढ़ फीट चौड़ी व सवा दो फीट गहरी खाई खोदी जाती है। इसमें 2 क्विंटल लकड़ी के धधकते अंगारे तैयार किए जाते हैं। इन अंगारों को 10 किलो देशी घी से धधकाया जाता है। चूल जिसमें अंगारे धधक रहे होते हैं, उन पर श्रद्धालु निकल जाते हैं। चूल में से निकलने से पूर्व उन श्रद्धालुओं को स्नान कराया जाता है और पास ही स्थित वेराई माता व हनुमानजी की पूजा-अर्चना के बाद चूल में निकलाया जाता है। देखने के लिए बड़ी संख्या में दूरदराज से श्रद्धालु आते हैं। पंडित प्रभुलाल शर्मा ने कहा कि इसमें से निकलने के लिए किसी भी भक्त से कमेटी या कोई कुछ कहता नहीं है, भक्त अपनी मर्जी से ही निकलता है।

जिलेभर में विशेष परंपराएं

3 पीढ़ियां एक साथ जुटती हैं पुतला बनाने में: होलिका का पुतला झालरापाटन निवासी इस्माइल बनाते हैं। उनकी तीन पीढ़ियां एक साथ पुतला बनाने में जुटती हैं। इस बार चौपड़िया बाजार के लिए होलिका का पुतला बनाया है। इस्माइल बताते हैं कि इस काम में वह, उनका पुत्र मोहम्मद हुसैन राजू और पोता रब्बानी पुतला बनाने में जुटे रहते हैं। सालों से होली के समय वह पुतला बनाते आ रहे हैं।


यहां होलिका के पुतले के दहन की सालों से है परंपरा: बुजुर्ग मनोहर प्रकाश अग्रवाल का कहना है कि सालों से यहां पर होलिका के पुतले के दहन की परंपरा है। लोगों का मानना है कि जिस तरह रावण के पुतले का दहन किया जाता है, उसी तरह होलिका का भी दहन होना चाहिए। इतिहासविद ललित शर्मा ने बताया कि महाराज राजेंद्र सिंह सुधाकर के समय होली के पर्व का नजारा कुछ अलग होता था। उस समय यहां विशाल पुतला कपड़े में रूई भरकर बनाया जाता था।


डग. धधकते अंगारों पर नंगे पैर निकलते हैं श्रद्धालु।

मनोहर प्रकाश

झालावाड़. झालरापाटन शहर में होली का पुतला तैयार करते कारीगर।
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