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शुभ मुहूर्त में आज होगा होलिका दहन
मनोहरथाना. कस्बे में कुमार को शुभ मुहूर्त में होलिका दहन किया जाएगा। पुरातन मान्यता अनुसार होलिका को अग्नि में नहीं जलने का वरदान प्राप्त था। किंतु उसके वरदान को उसने भगवान श्री हरि विष्णु के भक्त प्रहलाद को अग्नि में समर्पित करने के उद्देश्य से प्रह्लाद गोदी में बिठा लिया था। जिसमें हिरण्यकश्यप ने आग लगा करके होली का दहन किया। नारायण की कृपा से भक्त प्रहलाद बच गए। परंतु होलिका का दहन हो गया। तभी से इस होली के पर्व को मनाया जाता है एवं होलिका दहन किया जाता है। कस्बे में इसकी तैयारियां चल रही है। बाजारों में रंगबिरंगी पिचकारियों एवं गुलाल की दुकानें सज चुकी है। ग्रामीण अंचल में महिलाएं एवं बालिकाएं होली की पूजा अर्चना करती है ।
लुप्त हो रही परंपराएं
आधुनिकता के साथ ही परंपराओं का लुप्त होना जारी है। कस्बे की ममता एवं दुष्यंती ने बताया कि पूर्व के समय में होली दहन से पूर्व कस्बे की महिलाएं एवं बालिकाएं गोबर से बने विशेष सामानों एवं माला से होलिका की पूजा करती थी। इसी तरह होली दहन के उपरांत अगले दिन प्रातः काल में होली की अग्नि में गेहूं की बालियों को भुना जाता था। होलिका दहन की अग्नि से अपने घर के चूल्हे को जलाया जाता था। यह परम्परा ग्रामीण अंचल में आज भी संजोकर लाेगों ने रखी हे।और बखुबी निभा रहे है।
रायपुर: होली पर निकलती है शव यात्रा
रायपुर. कस्बे में होलिका दहन के दिन दहन से पूर्व फाडिया निकलता है, यानी शव यात्रा निकाली जाती है। लोगों का कहना है कि यह बुराई का प्रतीक है, जिसको होलिका दहन में रखकर बुराई को खत्म किया जाता है। यह पूरे गांव में डोल-ढमाकों के साथ निकालती है। होलिका दहन में इस फाडिया को रखकर इसका दहन किया जाता है। दूसरे दिन सवारी निकलती है। इसको शाही सवारी का नाम दिया गया है। इसमें राजा का पूरा दरबार सजाया जाता है। राजा के रूप में लोग सजते हैं। पूरे कस्बे में घूमते हैं। इसके बाद पूरा दरबार राजा के पीछे-पीछे चलता है। अलग-अलग समाज की ओर से यहां गैर भी निकाली जाती है।
भालता में अनूठी परंपरा, यहां गमगीन परिवार के साथ मनाते हैं होली
भालता. आदर्श ग्राम भालता में आदर्श होली मनाने की एक अनूठी परंपरा है, जो यहां सालों से जारी है। यहां पर ग्रामीण होली की शुरुआत गमगीन परिवार वालों के साथ रंग-गुलाल डालकर करते हैं। गांव में परंपरा है कि 1 साल के अंदर जिस घर में मरण मौत हुई है, जब तक उस घर में होली का रंग छाटा नहीं पड़ जाता, तब तक परिवार में कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता है। आज भी पुरानी परंपरा के अनुसार सारे ग्रामीण सुबह नौ बजे एक मंदिर पर एकत्रित होते हैं। इसमें हर समाज के लोग होते हैं। इसके बाद ढोल के साथ गांव के मुखिया को आगे कर अपने-अपने हाथों में रंग-गुलाल लेकर गांव की प्रत्येक गलियों में जाते हैं और जिनके घर परिवार में गमी हुई है, उनके यहां सर्वप्रथम रंग गुलाल लगाते हैं। गांव की भाषा में उसे होली का छाटा कहते हैं, जिसके बाद सारे लोग बालाजी के मंदिर में एकत्रित होते हैं और अपनी-अपनी बात रखते हैं। कोई होली की फाग सुनाता है, कोई चुटकुला सुनाता है। फिर सारे ग्रामीण ढोल के डंके पर होली के गीत सुनाते हैं। एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर होली मनाते हैं।