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क्षुल्लक बनकर लोगों को अहिंसा का पाठ पढ़ाया, बीमारी ने उन्हें फिर श्रावक बनाया, लेकिन अपना पथ नहीं भूले, अब इंदौर में बनवा रहे मंदिर

Bhaskar News Network

Apr 17, 2019, 09:35 AM IST

Jhalawar News - भगवान महावीर के अमर संदेश जियो और जीने दो यानी अहिंसा को अपनाने के लिए जैन संत बखूबी अपनी भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन...

Pidhawa News - rajasthan news teachings taught people the lesson of non violence disease made them shravakas but did not forget their path now temple built in indore
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भगवान महावीर के अमर संदेश जियो और जीने दो यानी अहिंसा को अपनाने के लिए जैन संत बखूबी अपनी भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन झालावाड़ जिले के पिड़ावा निवासी अशोक जैन ने भी स्वयं का कल्याण कर आमजन को भी अहिंसा के पथ पर चलाने के लिए आज भी लगे हुए हैं। उन्होंने मंदिर बनवाने के लिए इंदौर में समाज को अपना प्लॉट दिया और अपनी देखरेख में मंदिर बनवा रहे हैं।

पिड़ावा निवासी अशोक जैन अपने सांसारिक कामों से निवृत होने के बाद उन्होंने 10 साल तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालना किया और मुनि चर्या को अपनाया। इसके बाद स्वयं के कल्याण और लोगों का अहिंसा मार्ग प्रशस्त करने के लिए 24 जुलाई 2016 को आचार्य विवेक सागर महाराज से राजस्थान के ही अलवर में क्षुल्लक दीक्षा ली। कुछ समय दीक्षार्थी रहने के बाद उनको बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया। इस पर उनके गुरु ने उनको अपना इलाज कराने के लिए दीक्षा छेदने की अनुमति दी, लेकिन उन्होंने अपना पथ नहीं छोड़ा।

क्षुल्लक से श्रावक बनने के बाद भी धार्मिक कार्यों से जुड़े रहे। श्रावक बनने पर आज भी वे ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर रहे हैं। उन्होंने मध्यप्रदेश के इंदौर में अपना प्लॉट जैन समाज को दे दिया, अब उस प्लॉट पर मंदिर निर्माणाधीन है। वे अपना पूरा समय मंदिर निर्माण में दे रहे हैं। इस मंदिर के निर्माण व प्रतिष्ठा होने के बाद वे पुन: दीक्षा लेंगे।

10 साल से ब्रह्मचर्य व्रत का कर रहे थे पालन

अशोक ने 10-12 साल पहले ही वैराग्य के मार्ग पर जाने का मन बना लिया था। पिछले 10 साल से वे ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर रहे थे। दिन में एक समय भोजन करते व चटाई पर सोते थे। आज भी उनका यह क्रम जारी है। आज भी वे लोगों को धर्म से जुड़कर अपना स्वयं का आमजन के कल्याण का संदेश देते हैं।

अशोक से बने थे क्षुल्लक अचलसागर

आचार्य विवेक सागर महाराज ने अशोक भैया को क्षुल्लक दीक्षा दी थी। इसके बाद उनका नाम क्षुल्लक 105 अचल सागर महाराज हो गया था। उनकी दीक्षा अलवर में 24 जुलाई 2016 को हुई थी। धूमधाम से उनका दीक्षा महोत्सव मनाया गया था। अशोक भैया ने आचार्य विवेक सागर महाराज को श्रीफल भेंट कर क्षुल्लक दीक्षा देने का अनुरोध किया। अशोक भैया स्वयं, उनके परिजनों व समाज के लोगों की सहमति पर अशोक भैया का क्षुल्लक बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ। आचार्य विवेक सागर महाराज द्वारा स्वीकृति देने के साथ संस्कार क्रिया प्रारंभ हुई। पहले अशोक भैया ने गृहस्थ जीवन के कपड़ों का त्याग किया। आचार्य ने उन्हें दुपट्टा ओढ़ाया और क्षुल्लक बनाने के संस्कार होने पर पिच्छी, कमंडल, वस्त्र, शास्त्र व चांदी का भोजन पात्र भेंट किया था।

वैराग्य लेते समय भी मुस्कुरा रहे थे अशोक भैया

कहते हैं वैराग्य की राह आसान नहीं होती है। सब छूट जाते हैं, लेकिन अशोक भैया जब गृहस्थ जीवन त्याग कर क्षुल्लक की दीक्षा लेने मंच की ओर जा रहे थे तो उनके चेहरे पर अलग ही तेज था। वे मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। आचार्य विवेक सागर महाराज ने जब तक अशोक भैया के क्षुल्लक बनने के संस्कार कराए, उस समय तक वे मुस्कुरा रहे थे।

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