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मौसम और काली मस्सी का रोग झेल रही अफीम की फसल, किसानों को तोल पूरा करने की चिंता
काला सोना नाम से जाने जानी वाली अफीम की फसल इस वर्ष मौसम की मार और फसली रोग के फेर में पड़ गई है। जिससे किसान मायूस हो रहे है। इन दिनों खेतों में बोई अफीम की फसल में चीरा लगाकर डोडों से दूध के रूप में निकली अफीम को एकत्रित करने की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन डोडों से काफी कम मात्रा में अफीम निकलने के कारण किसान तोल पूरा करने को लेकर चिंतित हैं। एक और जहां तापमान में उतार-चढ़ाव के कारण डोडाें से दूध के रूप में अफीम कम निकल रही है तो दूसरी और काली मस्सी का रोग लगने से गुणवत्ता किस्म की प्रभावित होने से किसान चिंतित हैं।
ज्ञातव्य है कि क्षेत्र के मोतीपुरा, ब्रह्मपुरा, गणेशपुरा, रघुनाथपुरा, व कोली सहित कई गांवों में आबकारी विभाग द्वारा किसानों को अफीम के पट्टे जारी कर रखे हैं। जिसमें किसानों द्वारा अफीम की फसल की बुवाई की है, लेकिन इस वर्ष कड़ाके की सर्दी के बाद फरवरी के महीने में फूल से डोडे बनने की प्रक्रिया के दौरान कई बार तेज हवाएं चली और तापमान में भी उतार-चढ़ाव रहा। इस कारण अफीम की फसल में काली मस्सी नामक रोग बढ़ गया। जिससे अफीम के डोडे काले पड़ गए। जिससे दाने अफीम के दाने बनने की प्रक्रिया धीमी पड़ गई।
चीरा लगाने के बाद भी अफीम का दूध नहीं: गुराड़खेड़ा गांव के किसान पन्नालाल लोधा ने बताया कि डोडाें के चीरा लगाने के बाद भी अफीम का दूध नहीं निकलता है। वहीं खेत में चीरा लगा रही महिला किसान ललिता व कालीबाई ने बताया कि अफीम के लिए सर्दी का मौसम अनुकूल रहता है, लेकिन अधिक बारिश के चलते बुवाई में हुई देरी के कारण डाेडाें में चीरा लगाने की प्रक्रिया भी देरी से शुरू हुई।
रटलाई. क्षेत्र के गुराड़खेड़ा गांव में अफीम की फसल के डोडाें से अफीम एकत्रित करती महिला किसान।