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इस बार पढ़िए हाड़ौती के प्रसिद्ध होली महोत्सव

झालावाड़. झालरापाटन स्थित द्वारिकाधीश मंदिर परिसर में बुधवार को फागोत्सव मनाया गया। फागोत्सव में नाचती...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 01, 2018, 03:45 AM IST

इस बार पढ़िए हाड़ौती के प्रसिद्ध होली महोत्सव
झालावाड़. झालरापाटन स्थित द्वारिकाधीश मंदिर परिसर में बुधवार को फागोत्सव मनाया गया। फागोत्सव में नाचती महिलाएं।

भास्कर टीम. बारां/सांगोद/ नैनवां/ कैथून| होली यानी मस्ती का त्योहार। उड़ते रंग-गुलाल, गीतों पर झूमते महिला-पुरुष और बच्चे। मिठाइयों और गुजियों की बहार। गुरुवार को होलिका दहन के साथ 2 दिवसीय होली महोत्सव की शुरुआत हो जाएगी। लेकिन, हाड़ौती के कई इलाकों में अलग तरीके से होली मनाई जाती है। होली की ये मस्ती कई स्थानों पर 7 दिन तक चलती है। हाड़ौती की प्राचीन होली में सांगोद का न्हाण, किशनगंज का फूलडोल महोत्सव, नैनवां का हडूडा, शाहाबाद की लठमार होली और कैथून का विभीषण मेला प्रमुख है। ये प्राचीन होली इन इलाकों में कैसे मनाते हैं और कैसे पूरा समाज इनके रंग में रंग जाता है...इस पर फोकस भास्कर की स्पेशल रिपोर्ट।

सांगोद का न्हाण: 400 साल से मना रहे उत्सव, बादशाह की सवारी 8 को

धुलेंडी के अगले दिन यानी 3 मार्च को घुघरी की रस्म के साथ न्हाण लोकपर्व शुरू होगा। न्हाण लोकोत्सव में स्थानीय कलाकार स्वांग रचाते हैं। युद्ध होते हैं.. किन्नर अपने हाव-भाव से लोगों का मनोरंजन करते हैं। हाड़ौती ही नहीं प्रदेश भर से लोग न्हाण का आनंद लेने यहां आते हैं। कहा जाता है कि कालांतर में सांगोद 12 छोटे-छोटे गांवों में बंटा था। यहां मीणा, गुर्जर व जाट अधिक रहते थे। इन तीनों जातियों के मध्य पटेल बनने को लेकर विवाद हुआ, जिसमें मीणा व जाट एक दल में थे और गुर्जरों का अलग दल था। किंवदंती है कि गुर्जरों के दल ने जिस सेनापति सांगा गुर्जर के नेतृत्व में युद्ध लड़ा, वह लड़ता हुआ शीतला माता मंदिर में धराशायी हुआ। तभी से सांगोद में हास-परिहास और इतिहास को जिंदा रखने के लिए स्वांग रचकर कलाकार लोगों का मनोरंजन करते हैं। इस बार 4 मार्च को बाजार की भाले बारह, 5 को बादशाह, 7 मार्च को खाड़े की बारह भाले और 8 को बादशाह की सवारी के साथ समापन होगा।

5 दिन तक मचती है होली की हुड़दंग, स्वांग करते हैं मनोरंजन, हास-परिहास की जमती है महफिल

किशनगंज का फूलडोल महोत्सव: 4 दिन तक निकलेंगे स्वांग

बारां. किशनगंज का फूलडोल लोकोत्सव प्रदेशभर में प्रसिद्ध है। किशनगंज में इस साल 132 वां फूलडोल लोकोत्सव मनाया जाएगा। लोकोत्सव में सभी समुदाय के लाेग धर्म-जाति के भेद भूलकर आयोजन में सहयोग करते हैं। 4 दिन तक चलने वाले लोकोत्सव की तैयारी से लेकर उसे समापन तक ले जाने की जिम्मेदारी स्थानीय लोगों की होती है। इसमें तरह-तरह के स्वांग निकलते हैं। बकौल आयोजन समिति के गोपीवल्लभ चौरसिया लोकोत्सव की ख्याति के अनुसार फूलडोल के एक दिन पहले ही सभी समुदाय के घरों में दूरदराज से मेहमानाें के आने का सिलसिला शुरू हो जाता है। पूरे कस्बे को सजाया जाता है। जगह-जगह पर तोरणद्वार लगाकर मेहमानों का स्वागत किया जाता है। लोकोत्सव की शुरुआत धुलेंडी के दिन सुबह स्वांगों के साथ होती है। रात में शोभायात्रा में झांकियों का प्रदर्शन होता है। स्वांगों में प्रमुख रूप से रावण-जटायु युद्ध, ढोला-मारू समेत अन्य कई तरह के स्वांग निकलते हैं।

नैनवां का हडूडा, बारातों में दूल्हे और बाराती करते हैं अश्लील प्रदर्शन

नैनवां. रियासतकाल के समय से चली आ रही लोकानुरंजन हडूडा परंपरा आज भी जीवित है। पुराने समय में मनोरंजन के संसाधन समिति थे तब इस परम्परा के माध्यम से आपस में हंसी ठिठोली किया करते थे। धुलेंडी के दिन शहर के लोग दोपहर तक होली खेलते हैं फिर हडूडे के आयोजन में भाग लेते हैं। हडूडे में काल्पनिक नायक मालदेव व नायिका मालदेवणी की बारातें सजती हैं फिर हडूडे का आयोजन होता है। धुलेंडी की शाम साढ़े पांच बजे मालदेव चौक में नायक मालदेव की ओर मालदेवणी के चौक में नायिका मालदेवणी की बारात सजती है। दोनों बारातों में ऊंट पर दूल्हे सवार होते हैं। बारातों में शहरवासी बाराती बनते हैं, जो होली के अश्लील गीत गाते नाचते चलते हैं। दोनों बारातों के झंडे की गली पर पहुंचते ही दोनों पक्ष के बाराती लकड़ी की बल्ली व सतरंगी झंडे का प्रदर्शन करते हैं। दोनों पक्ष के दूल्हे एक-दूसरे की तरफ अश्लील प्रदर्शन करते हैं। बराती भी ऐसा ही करते हैं।

झालावाड़. झालरापाटन स्थित द्वारिकाधीश मंदिर परिसर में बुधवार को फागोत्सव मनाया गया। फागोत्सव के दौरान उपस्थित महिलाअों की भीड़।

शाहाबाद में बरसाने की तर्ज पर 4 दिन चलती है लठमार होली

शाहाबाद क्षेत्र के गांवों में बरसाने की तर्ज पर लठमार होली खेली जाती है। यहां होलिका दहन के दूसरे दिन यानी धुलेंडी पर विभिन्न समाजों के मंदिरों पर टेशू के फूल से बनाए प्राकृतिक रंग होते हैं। केसरिया रंग पहले भगवान को चढ़ाया जाता है। इसके बाद बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर होली की शुरुआत होती है। ग्रामीण क्षेत्र में गुलाल-अबीर उड़ाया जाता है। यहां लठमार परंपरा के तहत होली होती है। महिलाएं लाठियों से वार करती हैं और युवाओं की टोली अबीर-गुलाल लगाती है। यहां चार दिनों तक होली चलती है। इस दौरान युवक रांई स्वांग रचकर नृत्य करते हैं। इसे देखने के लिए गांवों से भी भीड़ उमड़ती है।

होलिका दहन आज, कल रंगों की बरसात, सूखी होली मनाइए

झालावाड़. दो दिनों तक होली पर्व की धूम रहेगी। इस दौरान जगह-जगह होलिका दहन व फागोत्सव का आयोजन होगा। फागोत्सव में श्रीकृष्ण की भक्ति करते हुए फूलों व गुलाल की होली से लोग सरोबार होंगे। दो दिन तक होने वाले कार्यक्रमों की तैयारियों को लेकर धार्मिक व सामाजिक संस्थाएं तैयारियों में जुटी है। खंडेलवाल समाज ने बुधवार को बाल श्रीकृष्ण के साथ फूलों की होली खेल फागोत्सव मनाया। शहर में बस स्टैंड, मंगलपुरा, मोटर गैराज, जवाहर कॉलोनी, सुभाष चौक पर होली दहन को आकर्षक बनाने के लिए डीजे साउंड, गुलाल आदि की व्यवस्था की गई है। गुरुवार को शुभ मुहूर्त साढ़े 7 से 9 बजकर 15 मिनट पर पूजा अर्चना के बाद होली का दहन किया जाएगा। इसके बाद शुक्रवार को धुलेंडी पर गुलाल व सूखे रंगों से होली खेली जाएगी। कुछ समाज के लोगों ने पानी की बर्बादी को देखते गुलाल से सूखी होली खेलने का निर्णय लिया है।

डग में धधकते अंगारों पर कल निकलेंगे चूल: चौकरी दरवाजा स्थित तेजेश्वर महादेव मंदिर परिसर पर शुक्रवार को धुलेंडी पर रंग खेलने के बाद चूल का आयोजन होगा। चूल 10 फीट लंबी, दो फुट चौड़ी, 2 फुट गहरी खोदी जाती है। जिसमें आग जलाकर अंगारे तैयार किए जाते है। जिन अंगारों को 10 किलो घी थोड़ा थोड़ा डालकर कर धधकते बनाए जाते है। जिसमें महिला पुरुष व बच्चे करीब 40 से 50 लोग दो बार निकलते है।

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