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सियासी बाजीगर ; लगातार दो चुनाव हारने के बाद तीसरी बार मैदान में उतरे 75 में से 70 उम्मीदवार जीते

3 वर्ष पहले
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द ग्रेट पॉलिटिकल मूवी - ‘राजस्थान की सरकार’... की स्क्रिप्ट हो चुकी है। स्टार कास्ट (उम्मीदवारों का चयन) भी तय है और शूटिंग (चुनाव प्रचार) शुरू हो चुकी है। बॉक्स अॉफिस (चुनावी नतीजे) के आंकड़े बताते हैं कि जब-जब सियासी बाजीगरों को मौका दिया गया तो 95% हैप्पी एंडिंग (चुनाव में जीत) ही हुई है। राजस्थान के सियासी सिनेमा के इतिहास पर नजर डालें तो 1952 से अब तक 75 ऐसे प्रत्याशी मैदान में उतरे, जो लगातार दो बार चुनाव हार चुके थे। इनमें से 70 उम्मीदवार जीत दर्ज करके ‘सियासी बाजीगार’ बन गए। फिर भी कांग्रेस ने इस बार 23 ऐसे नेताओं के टिकट काटे, जो दो बार हारे, लेकिन इस बार जीत सकते थे। कांग्रेस ने जब भी दो बार हारने वाले को तीसरी बार मैदान में उतारा...सिर्फ दो मौकों को छोड़ सभी में जीती। वहीं, भाजपा ने लगातार चार-चार दफा हारने वाले को भी टिकट दी और कांग्रेस से सीटें छीनीं। दो बार हारने वालाें को टिकट के सिर्फ 3 मामलों को छोड़ भाजपा सभी में जीती। पूर्व विधानसभाध्यक्ष सुमित्रासिंह कहती हैंं, दो बार हारा पूूरी ताकत झोंकता है, क्योंकि राजनीतिक जीवन खत्म होने की आशंका होती है। उसे लाेगों की सहानुभूति भी मिलती है। इसलिए वह जीतता है। चुनाव विश्लेषक संजय लोढ़ा कहते हैं, पार्टियों में दस साल में ताकतवर प्रतिद्वंद्वी पैदा हो जाते हैं और उनके दबाव में टिकट बदले जाते हैं।

कांग्रेस का फॉर्मूला-दो बार हारे तो तीसरी बार नहीं जीतेंगे...भास्कर दिखा रहा जमीनी हकीकत
ट्विस्ट ये कि...कांग्रेस में 4 बार हारी ममता को भी भाजपा ने टिकट दिया
भाजपा ने इस दफा दो बार हारने वाले छह लोगों को टिकट दिया है। इनमें बूंदी में लगातार चार बार हारी नेता ममता शर्मा भी हैं। वे हाल में कांग्रेस से भाजपा में आई हैं। इसके अलावा सरदारपुरा में अशोक गहलोत के खिलाफ खड़े शंभुसिंह भी दो बार हार चुके हैं। बाड़ी से जसवंत गुर्जर, बस्सी से कन्हैयालाल मीणा, लक्ष्मणगढ़ से दिनेश जोशी व खेतड़ी से धर्मपाल गुर्जर के नाम हैं।

ऐसे भी उदाहरण... जब पिछले में बेहद खराब प्रदर्शन के बावजूद अगले में चुनाव में जीत दर्ज की
...जबकि कांग्रेस लगातार तीन और दो बार चुनाव हारने वाले को भी टिकट देकर बाजी मार चुकी है

लगातार दो बार हारने के बाद तीसरी बार टिकट न देने का फॉर्मूला कांग्रेस में ही है। 1998 के बाद इसका ज्यादा इस्तेमाल हुआ। जबकि आंकड़े बताते हैं कि जब भी कांग्रेस ने ऐसे प्रत्याशी को उतारा, वो जीता है।

शीशराम ओला के बेटे ब्रिजेंद्र ओला 1996, 1998 और 2003 में लगातार हारे, चौथी बार जीते।

धौलपुर में दो बार हारे बनवारी शर्मा ने 93 में वसुंधरा को हराया

गुलाबसिंह शक्तावत 1977 और 80 में हारे और 85 में जीते।

85-90 में हारे राधेश्याम ने 03 में भैरोसिंह शेखावत को हराया।

98-03 में नीमकाथाना से हारे रमेश खंडेलवाल 08 में जीते। इसी सीट पर 85-90 में हारे मोहनलाल मोदी 1993 में जीते। महवा से शिवचरण (1967) बारां से शिवनारायण (1985) बयाना से ब्रिजेंद्रसिंह (1995) मुंडावर से ओपी (2008) डग से दीपचंद (1985) सागवाड़ा से सुरेंद्र (2008) रायपुर से सुखलाल (1993) जालौर से रामलाल (2008)

भाजपा नेता राजेंद्र राठौड़ भी शामिल हैं सियासी बाजीगरों में

राजेंद्र राठौड़ को पहले चुनाव में 80 में बनीपार्क से महज 2031 वोट मिले। फिर वे चूरू से लड़े और हारे। लेकिन 90 में जीते। 93 में भाजपा में आए और कर तीन चुनाव लगातार जीते। इसके बाद 2008 में वे तारानगर और 2013 में फिर चूरू से जीते।

माकपा नेता हेतराम बेनीवाल संगरिया 1980 और 1985 में हारे और 1990 में जीते पिलानी में जनता पार्टी ने कांग्रेस लहर में 1980 में निर्दलीय हजारीलाल को उतारा और वे जीते मोहनप्रकाश राजाखेड़ा 1985 नंदकिशोर महरिया फतेहपुर 2013 जद नेता कैलाशचंद्र राजसमंद से 1977 जैतारण से दिलीप चौधरी 2008 जायल से गंगासिंह 1962 में स्वतंत्र पार्टी से गुढ़ा से शिवनाथ सिंह लगातार चार चुनाव हारे और 1993 में जीते और इनकी पहले चुनाव में जमानत जब्त हुई आैर अगले में विधायक बन गए बनेड़ा से उमराव सिंह 1977 में विधायक बने लेकिन इससे पहले चुनाव में उनकी जमानत तक जब्त हो गई थी।

बानसूर से रोहिताश्वकुमार (1993) आहोर से भगराज चौधरी 1985 पचपदरा से अमराराम (1993)

...उधर भाजपा ने 4-4 और 3-3 बार चुनाव हारने वालों को भी टिकट दिया और जीत हासिल की

टोडाभीम से 2003 में भाजपा के बत्तीलाल जीते,वे चार चुनाव हार चुके थे। कुंजीलाल बामनवास से दो बार तीसरे नंबर पर रहे और 2013 में जीत दर्ज की। सागवाड़ा से कनकमल 3 चुनाव हारे, 2002 में जीते।

सुरेंद्र सिंह राठौड़ 1993 और 1998 में हारे, 2003 में जीते।

सुरेंद्रपाल 2003 में जीते।

डॉ. रामप्रताप 2003 और 2008 में हारे, 2013 में जीते।

मानिकचंद 1993 और 1998 में हारे, लेकिन 2000 में जीते।

डूंगरगढ़ : इसी श्रेणी के किशनाराम 90 और 13 में जीते।

तारानगर : ज. ना. पूनिया 13।

हिंडौन से उम्मेदीलाल (1972) बैराठ से ओपी गुप्ता (1990) समर्थलाल राजगढ़ (1993) दाताराम खेतड़ी (2003) केडी बाबर लक्ष्मणगढ़ (2003) मदनमोहन सिंगल कामां (2003) अशोक सरदारशहर (2008) हेमसिंह थानागाजी (2008) सपोटरा रंगजी मीणा (1993) रणधीर वल्लभनगर (2003) सराड़ा गमीरलाल (1990) जहाजपुर से शिवजीराम (2003) शाहपुरा भैरूलाल बैरवा (1990) जैतारण से सुरेंद्र (1990)

सोजत एलएन दवे (2003)

देसूरी अचलाराम (1990)

भीनमाल से पूराराम चौधरी और गुढ़ामालानी से लाधूराम।

ये वो हैं...जो टिकट न मिलने पर बागी होकर जीते

फतेहपुर से नंदकिशोर महरिया (2013) आमेर से नवीन पिलानिया (2013) गंगापुर में गोविंद सहाय (1977) किशनगंज में हेमराज मीणा (2003) श्रीमाधोपुर से हरलाल सिंह खर्रा (2003)

...फिर भी कांग्रेस ने इस बार ऐसे 23 उम्मीदवारों का टिकट काटा...भाजपा ने 6 को दिया
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