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खेतों में स्थाई मेढ़ बनाकर मक्के की खेती से 10% तक बढ़ती है पैदावार

2 वर्ष पहले
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बारिश की अनिश्चितता, ग्राउंड वाटर के गिरते स्तर और तापमान में वृद्धि के कारण खरीफ के दौरान धान की जगह खेत में मेढ़ बनाकर मक्के की खेती की नई विधि विकसित कर ली गई है। यह किसानों 10% ज्यादा पैदावार देने के साथ-साथ पानी की बचत में सहायक भी है। राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा (समस्तीपुर) ने 10 वर्षों के अनुसंधान के बाद मेढ़ बना कर खरीफ मक्का की खेती की विधि विकसित की है। बिहार में एक किलो मक्का की पैदावार के लिए 1150 से 9,500 लीटर पानी की ज़रुरत होती है। इतनी ही धान की पैदावार के लिए 3,500 से 5,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है ।

पूसा कृषि विश्वविद्यालय ने 10 वर्षों के प्रयोग से तैयार की नई तकनीक

इस तकनीक से जुताई के खर्च में भी कमी आती है

अनुसंधान से जुड़े वैज्ञानिक मृत्युंजय कुमार ने बताया कि खेत में स्थाई तौर पर मेढ़ बनाकर उस पर मक्का और अन्य फसलों की खेती से फसलों को पानी की कम ज़रुरत होती है। इससे पैदावार में वृद्धि होती है। स्थाई तौर पर मेड़ के रहने से किसानों को हर फसल में जुताई का खर्च भी बचता है ।

दो पौधों के बीच की 18 सेंटीमीटर दूरी जरूरी

समस्तीपुर और बेगूसराय जिले में 2009 से 2018 तक अलग अलग पद्धति से मक्के की खेती के दस प्रयोग किए गए। इनमें स्थाई मेढ़ विधि को उत्पादन और लागत की दृष्टि से सबसे ज्यादा उपयुक्त पाया गया । इस विधि में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 67 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 18 सेंटीमीटर रखी गई था।

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