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200 साल पुरानी श्लील गायन परंपरा कम होती दिखी, 25 साल बाद मूलसा ने फिर खंखारा गला

महाराजा मानसिंह के शासनकाल से शुरू हुई थी श्लील गायन की परंपरा

Dainik Bhaskar

Mar 04, 2018, 08:20 AM IST
200 years old Singing tradition in jodhpur

जोधपुर. आन बान शान की संस्कृति से जुड़े मारवाड़ में महाराजा मानसिंह के शासनकाल में संगीत की परंपरा से इसकी शान में एक ओर नगीना जुड़ा जो आज दिन तक कायम है। संगीत के कारण ही मानसिंह के शासन काल को रसिया राज के नाम से पुकारा जाने लगा। उनकी ओर से शुरू की गई श्लील गाली गायन परंपरा को शहरवासी आज तक निभाते आ रहे हैं।

गायकी की इस परंपरा को आगे बढ़ाने में यूं तो कई नाम है, मगर जिन्होंने अपनी खास पहचान कायम की उनमें स्व. आत्माराम रामदेव आतूजी, स्व.दाउलाल रामदेव,स्व. मदन मस्ताना, माईदास थानवी, एसएन व्यास मूलसा, दिनेश नरेश बोहरा, कृपाकिशन भासा इस परंपरा को आगे बढ़ाने में बरसों तक गायन किया। इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए युवा भी आगे आ रहे हैं।

मगर पिछले कुछ वर्षों से गेर खर्च बढ़ने के कारण गायकों की संख्या घटने लगी तो करीब 25 साल बाद फिर से इस होली पर मूलसा ने मोर्चा संभाला और इस परंपरा को जिंदा रखने व आगे बढ़ाने के लिए युवाओं को जोश दिलाया। नई पीढ़ी में गोविंद फाग के युवाओं ने कई सालों तक माईदास थानवी के स्तर तक गायकी से अपनी पहचान बनाई। इसके बाद अवीन केवलिया, मनोज बेली में से इस साल केवल ललित मत्तड़ ही रह गए।

जोधपुर में श्लील गाली गायन अपनी खास पहचान बनाए हुए है। मैने इस परंपरा को करीब 75 साल तक निभाए रखा अब उम्र ज्यादा होने से विराम लेना पड़ा। यह परंपरा रुकनी नहीं चाहिए युवाओं को आगे आकर भीतरी शहर की इस परंपरा को कायम रखना जरुरी है।
माईदास थानवी

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