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भंसाली, दीपिका, रणवीर को हाईकोर्ट से राहत, फैसला सुनाते जज भावुक हुए

याचिका स्वीकार कर एफआईआर निरस्त की, एक दिन पहले ही बैंच ने स्पेशल स्क्रीनिंग के लिए देखी थी मूवी

Bhaskar News| Last Modified - Feb 07, 2018, 08:02 AM IST

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Bhansali Deepika and Ranvir get relief from the High Court

जोधपुर. पद्मावत फिल्म के निर्माता संजय लीला भंसाली, अभिनेता रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण को मंगलवार को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जस्टिस संदीप मेहता ने निर्माता भंसाली की ओर से दायर विविध आपराधिक याचिका स्वीकार करते हुए उनके विरुद्ध डीडवाना थाने में धार्मिक भावनाएं आहत करने के लिए दर्ज कराई गई एफआईआर को अपास्त कर दिया। कोर्ट ने कहा- फिल्म में राजपूती शौर्य, राजस्थान व मेवाड़ के गौरव का बेहतरीन गुणगान किया गया है। इससे एक दिन पहले सोमवार रात स्पेशल स्क्रीनिंग के लिए जस्टिस मेहता की बैंच ने पद्मावत मूवी भी देखी थी। फैसला सुनाते वक्त जस्टिस मेहता थोड़ा भावुक भी हो गए थे।


कोर्ट ने मौखिक रूप से यह भी कहा कि कला अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इस तरह तो अनुच्छेद 19 (1) के तहत मिले वाक व अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। फिल्म पद्मावत का राज्य में प्रदर्शन करने, दर्शकों तथा कलाकारों की  सुरक्षा करना राज्य सरकार का कर्तव्य है। कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए भंसाली, रणवीर व दीपिका के विरुद्ध दर्ज एफआईआर को निरस्त कर दिया।

 

कोर्ट ने उदाहरण से समझाया, चित्रण को सराहा भी

सभी पक्ष सुनने के बाद कोर्ट ने कहा, कि धारा 153-ए तो धर्म, मूलवंश, भाषा, जन्म स्थान, निवास स्थान आदि के अाधारों पर दो या विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन करने या सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव डालने से संबंधित है, लेकिन फिल्म में किसी दो समुदायों या जाति के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन करने या सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कोई तथ्य नहीं हैं। इसलिए धारा 153-ए व बी चलने योग्य नहीं हैं। इसी तरह आईपीसी की धारा 295 जो किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान कर उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने से संबंधित है, लेकिन पद्मावती हिस्टोरिकल आइकन है, ऐसे में यह धारा भी चलने योग्य नहीं हैं। उन्होंने धार्मिक आस्था समझाने के लिए करणी मां का भी उदाहरण दिया।

 

अपील की बजाय सीधे एफआईआर गलत

 -  उन्होंने यह भी तर्क दिया, कि सेंसर बोर्ड को सिनेमेटोग्राफी एक्ट के तहत मूवी को रिलीज करने के लिए मंजूरी देने का अधिकार है तथा सेंसर बोर्ड संवैधानिक संस्था है। ऐसे में बोर्ड द्वारा मंजूर की गई मूवी के खिलाफ भावनाएं भड़काने या अन्य आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज नहीं कराई जा सकती है।

- उन्होंने यह भी तर्क दिया, कि अगर कोई सेंसर बोर्ड द्वारा फिल्म जारी किए गए सर्टिफिकेशन से सहमत नहीं हैं तो अपील की जा सकती है, इसके लिए बाकायदा ऑथोरिटी है, लेकिन इस मामले में अपील न करके सीधे एफआईआर ही दर्ज करा दी गई जो कि विधिसम्मत नहीं हैं।

 

पद्मावती के साहस व सैन्य रणनीति कौशल की कहानी

जस्टिस मेहता ने मौखिक रूप से कहा, कि मूवी के डिस्क्लेमर को पढ़कर ही सारी शंकाएं दूर हो जाती हैं। फिल्म में राजस्थान और मेवाड़ के गौरव का गुणगान किया गया है। राजपूताना के शौर्य को दर्शाती है। चित्तौडगढ के राजा के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया गया है। फिल्म में रानी पद्मावती के साहस, आवाज, ज्ञान तथा उसके सैन्य रणनीति के कौशल को बखूबी दिखाया गया है जो दुश्मनों से किस तरह अपने राजा को बचाती है।

 

 

रिलीज से पहले कैसे कह सकते हैं भावनाएं आहत 
याचिकाकर्ता संजय लीला भंसाली व अन्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रवि भंसाली व अधिवक्ता निशांत बोड़ा ने बहस करते हुए कोर्ट को बताया, कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध दर्ज एफआईआर प्री मैच्योर है, क्योंकि एफआईआर दर्ज कराने के ग्यारह महीने बाद 25 जनवरी 18 में फिल्म रिलीज हुई। ऐसे में बिना देखे कैसे कहा जा सकता है, कि भावनाएं आहत हुई हैं।


पद्मावती के चरित्र को ठेस नहीं पहुंचाई
अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि यह आरोप भी निराधार है, कि मूवी में अलाउद्दीन खिलजी व रानी पद्मावती के बीच कोई लव सीन फिल्माया गया है। फिल्म में राजपूताना की आन-बान और शान का पूरा ध्यान रखा गया है और रानी पद्मावती का पूरा महिमामंडन किया गया है। रत्तीभर भी उनके चरित्र को ठेस नहीं पहुंचाई गई है। याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट के ध्यान में यह भी लाया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी फिल्म को मंजूरी दे दी, इसलिए एफआईआर खारिज करने योग्य है।


रानी का नाच दिखाना परंपरा के खिलाफ
सरकार की ओर से एएजी एसके व्यास व शिकायतकर्ता की ओर से केएस राठौड़ ने बहस करते हुए कोर्ट को बताया कि एफआईआर नहीं, बल्कि पिटीशन प्री मैच्योर है। फिल्म से राजपूत समुदाय और हिंदू की भावनाएं आहत हुई हैं। पूरे देश में लोग मूवी के खिलाफ में सड़कों पर आ गए। घूमर गाना सौम्य गीत है, लेकिन इसमें रानी का नाच दिखा दिया गया जो कि परंपरा के खिलाफ है। पद्मावती एक हिस्टोरिकल आइकॉन है।

 

वकीलों व लोगों से खचाखच भर गया कोर्ट रूम

 

इससे पूर्व याचिका पर सुनवाई शुरू होने से पहले कोर्ट रूम खचाखच भर गया। कोर्ट रूम में तिल रखने की जगह नहीं थी। कोर्ट रूम के बाहर भी बड़ी संख्या में अधिवक्ता व लोग फैसला जानने के लिए खड़े थे। सुरक्षा के लिहाज से कोर्ट रूम के बाहर पुलिस का जाब्ता तैनात था। फैसले के बाद कोर्ट परिसर में पुलिस जाब्ता तैनात किया गया। जजों के घर जाने के समय उनके रूट पर हथियारबंद जवान लगाए गए। सभी जजों के कोर्ट से चले जाने के बाद जाब्ता हटाया गया।

 

 

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