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730 दिन से वेंटिलेटर पर, घर ही आईसीयू, बेटा नौकरी छोड़ जुट गया है बचाने में

दो साल पहले तक सबकुछ ठीक चल रहा था लेकिन एक दिन अचानक पिताजी के दहीने हाथ ने काम करना बंद कर दिया।

Dainik Bhaskar

Jan 07, 2018, 07:36 AM IST
Son has left the job to save

जोधपुर. उम्र 57 साल, लेकिन कुदरत ने ऐसी जंजीर में जकड़ दिया है कि अब खुद उठ भी नहीं पाते। न ही किसी से कुछ कह पाते हैं। परिवार से बातचीत बस आंखों के इशारों में होती है। यह पीड़ा है जोधपुर के रहने वाले मदनलाल सेन की। ये बीते 2 साल से एक रेयर बीमारी मोटर न्यूरॉन से ग्रसित हैं। इस कारण उनके बेटे सुरेन्द्र सेन को उदयपुर कोर्ट में लगी सरकारी नौकरी भी छोड़नी पड़ी। तब से लेकर अभी तक बस पूरे परिवार का एक ही उद्देश्य है- पिता की सेवा। मदनलाल के बड़े बेटे सुरेंद्र सेन बताते हैं कि दो साल पहले तक सबकुछ ठीक चल रहा था लेकिन एक दिन अचानक पिताजी के दहीने हाथ ने काम करना बंद कर दिया।

हाथ धीरे-धीरे पतला भी होने लगा। हमने उन्हें कोटा के राजस्थान आयुर्वेदिक हॉस्पिटल में 20 दिन तक भर्ती रखा, आयुर्वेदिक थैरेपी दिलवाई। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्हें सांस लेने में भी तकलीफ होने लगी। जब हमने जोधपुर में दिखाया उन्होंने सभी जांच कराकर न्यूरोलॉजी के डॉक्टर को दिखाने के लिए कहा। बाद में न्यूरोलॉजी के डॉक्टर को भी दिखाया पर उन्होंने जांच रिपोर्ट देखकर दिल्ली जाने के लिए कहा। दिल्ली में भी दिखाया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

बाद में बड़े भाई के एक परिचित पीजीआई चंड़ीगढ़ में थे उन्होंने वहां आने को कहा तो हम पीजीआई चंडीगढ़ लेकर चले गए। जहां 5 दिन इमरजेंसी मे रखकर जांच कराई। कुछ पता नहीं लग पाया। बाद में उन्होंने रीढ़ की हड्डी से सैंपल लेकर एक जांच की तो पता चला कि पिताजी को एक रेयर बीमारी है जिसको मोटर न्यूरॉन डिजीज कहते है। बाद में पीजीआई के डॉक्टरों ने कहा इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है, इसको शरीर में आगे बढ़ने से रोका जा सकता है। हॉस्पिटल में तीन माह इलाज किया। बाद में अस्पताल ने डिस्चार्ज कर एक माह बाद दिखाने को कहा।

वहां से जब जोधपुर ला रहे थे तो बीकानेर के पास आते ही पिताजी की तबीयत खराब हो गई जिसके चलते उन्हें बीकानेर के अस्पताल में भर्ती कराया। वहां वेंटिलेटर नहीं होने के चलते उन्होंने तुरंत जोधपुर मेडिकल कॉलेज के लिए रैफर कर दिया। बाद में वहां से एंबुलेंस से जोधपुर के एमडीएम अस्पताल लेकर आए। जहां पिताजी को सीधे ट्रॉमा आईसीयू में वेंटिलेटर पर भर्ती किया। और करीब पांच माह तक वहां वेंटिलेटर पर रखा। लेकिन बाद में डॉक्टरों ने इन्हें घर ले जाने को कहा तो हम घर लेकर आ गए। मदनलाल के छोट पुत्र भुवनेश सेन बताते हैं कि अब हमने घर के एक कमरे को आईसीयू में तबदील कर दिया। यहां वेंटिलेटर सहित सभी जरूरी मशीनें हैं।

एमडीएम के ट्राॅमा आईसीयू के इंचार्ज डॉ. विकास राजपुरोहित ने काफी मदद की और एक नर्सिंग स्टाफ को भी अपनी सेवाएं देने के लिए कहा, जो सुबह शाम आकर पिताजी को देखता है। एक फिजियोथैरेपी के डॉक्टर अब आकर घर पर रोज पिताजी को एक्सरसाइज कराते हैं। सुरेन्द्र सेन बताते हैं कि पिछले दो साल से हमने पिताजी को एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा है।

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