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रेगिस्तान में उगा डाले ताइवानी पपीते, किसान की कमाई सुन हैरान रह जाएंगे

आसपास के किसान भी राजूसिंह का बगीचा देखने आ रहे हैं।

महेश रामावत | Last Modified - Jan 02, 2018, 03:00 AM IST

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    एक पौधे से 4 हजार रु. तक मुनाफे की उम्मीद।

    देचू (जोधपुर). देचू पंचायत समिति के गांव रावतगढ़ में किसान राजूसिंह करणोत ने कृषि के क्षेत्र में नवाचार किया है। उन्होंने अपने फार्महाउस पर ताइवानी पपीते की खेती शुरू की है। जिले में ताइवानी पपीते की यह पहली खेती है। यह कम मेहनत व लागत में अच्छा मुनाफा देने वाली साबित होने की उम्मीद है। आसपास के किसान राजूसिंह का बगीचा देखने आ रहे हैं।

    - कृषि पर्यवेक्षक कंवराराम यादव ने बताया कि पहले यहां के किसान पपीतें के एक-दो पौधे लगाते थे, लेकिन बड़ी संख्या में पपीते की यह पहली बार खेती की गई है। इससे अन्य किसानों का रुझान भी बढ़ेगा।

    -किसान राजूसिंह ने बताया कि हर बार बेमौसम बरसात से फसलें खराब हो रही थी। छह महीने पहले काजरी से परामर्श के बाद 25 रुपए हजार रुपए की लागत से ताइवान किस्म के पपीते के एक हजार पौधे लगाए।

    एक पौधे से 4 हजार रु. तक मुनाफे की उम्मीद
    - इसमें ज्यादा देखरेख की जरूरत नहीं हैं। पपीते के पौधे एक बीघे में 5-5 फीट की दूरी से 636 पौधे लगते हैं। इससे जगह भी बहुत कम लगती हैं।

    - पौधों में 4-5 दिन में एक बार बूंद-बूंद सिचाई पद्धति से पानी पिलाया जा रहा है। पौधा बड़ा होने के बाद 3 साल तक फल देगा।

    - इसमें एक पौधे पर एक साल में एक क्विंटल पपीते लगते हैं। लागत निकालने के बाद प्रति पौधा करीब 4 हजार रु. तक का मुनाफा होने की उम्मीद है।

    - इनसे प्रेरित होकर किसान पूराराम चौधरी, भवानीसिंह, बीरबल विश्नोई, पृथ्वीसिंह करणोत ने भी अपने यहां ताइवानी पपीते की खेती करने का निर्णय लिया है।

    गुलाब की खेती कर घरेलू उद्योग लगाया गुलकंद, गुलाबजल

    - कस्बा क्षेत्र में गुलाब की खेती से अब किसानों की खुशहाली बढ़ रही है। अधिकांश किसान तोल केंद्र पर अपने गुलाब के फूलों की सप्लाई कर रह रहे हैं। चिकारडा के सांवलिया मार्ग स्थित बस्ती के एक सामरिया परिवार ने गुलाब के फूलों को तोल केंद्र पर देने के बजाय करीब 6 माह से अपना घरेलू कुटीर उद्योग लगाकर गुलकंद, गुलाब जल, शर्बत आदि तैयार करने का काम शुरू किया है।

    - किसान किशनलाल सामरिया ने बताया कि खुद की 5 बीघे पर की जा रही गुलाब की खेती से प्रतिदिन प्राप्त होने वाले करीब 50 किलो फूलों से देशी तरीके से कुटीर उद्योग में ओखली में शक्कर मिश्रण कर फूलों को मूसल से कूट-पीट कर गुलकंद तैयार किया जाता है।

    - स्नातक तक शिक्षित बेटा देवकरण इस काम में सहयोग करते हुए भट्टी पर तांबे का भांडा चढ़ाकर संयंत्र द्वारा आसवन विधि से अर्क तैयार करता है।

    - गुलकंद, गुलाब जल, गुलाब शर्बत के साथ ही नीम गिलोय व तुलसी अर्क भी तैयार किया जाता है। इन उत्पादों के तैयार करने में सास-बहू का भी योगदान रहता है।

    - सामरिया ने बताया कि परिवार की फर्म के नाम का जीएसटी लाइसेंस भी ले रखा है।

    - उन्होंने बताया कि इस कुटीर उद्योग के बारे में उन्होंने हल्दीघाटी जाकर उद्यमियों से दक्षता हासिल की। उसी तर्ज पर गृह उद्योग चालू किया।

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    गुलाब के फूलों की पत्तियां चुनता परिवार।
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